
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (George Abraham Grierson) पहले ऐसे अंग्रेज थे जिन्होंने आधुनिक भारत में भाषाओं का सर्वेक्षण किया और विद्यापति तथा तुलसीदास जैसे भारतीय कवियों को विश्वभर में परिचित कराया। विदेशी होने के बावजूद उनकी धाराप्रवाह भोजपुरी सुनकर लोग अचंभित रह जाते थे।
उन्होंने ही सबसे पहले भोजपुरी भाषी लोगों के लिए ‘भोजपुरिया’ शब्द का प्रयोग किया था। अपने करियर के दौरान उन्होंने बिहार और बंगाल में लंबे समय तक उच्च पदों पर कार्य किया और कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भाषा के क्षेत्र में उनके असाधारण कार्यों के कारण उन्हें भाषा वैज्ञानिक भी कहा जाता है।

ग्रियर्सन का बिहार से गहरा लगाव
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का अधिकांश समय बिहार में बीता। वे 1871 में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 1873 के अक्टूबर माह में भारत आए। उनकी पहली नियुक्ति बंगाल के जैसोर ज़िले में सहायक मजिस्ट्रेट के रूप में हुई, जहाँ वे लगभग छह महीने तक कार्यरत रहे। मार्च 1874 में वे अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए पटना पहुँचे और वहाँ छह महीने तक रहे। इस दौरान उन्होंने उत्तर बिहार के कई क्षेत्रों का भ्रमण किया।
1874 में ही उन्होंने वर्नाक्यूलर (हिन्दी और बंगला) की पहली परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उनका स्थानांतरण हावड़ा, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर में हुआ, जहाँ रहते हुए उन्होंने बंगला भाषा में दक्षता प्राप्त की। 1876 में उन्होंने द्वितीय वर्नाक्यूलर परीक्षा (संस्कृत) भी उत्तीर्ण की और फिर उड़ीसा के रंगपुर चले गए। अगस्त 1877 में उनका स्थानांतरण भागलपुर हुआ, जहाँ वे तीन महीने रहे। दिसंबर 1877 में वे मधुबनी पहुँचे, जहाँ उन्होंने तीन वर्षों तक संयुक्त मजिस्ट्रेट और प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के डिप्टी कलेक्टर के रूप में कार्य किया।
जुलाई 1880 में वे अपने घर डबलिन (आयरलैंड) लौट गए और सितंबर 1880 में लूसी एलिज़ाबेथ जीन कालिस से विवाह किया। तीन महीने बाद वे पुनः भारत लौटे और बिहार में इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स के पद पर नियुक्त हुए। मार्च 1882 में वे पटना में मजिस्ट्रेट और कलेक्टर बने, लेकिन छह महीने बाद उनका तबादला शाहाबाद हो गया। कुछ समय बाद वे दिनाजपुर चले गए, फिर 1882 में पुनः पटना लौटे।
1885 में उन्होंने वियना में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस के सातवें अधिवेशन में भाग लिया और डेढ़ वर्ष बाद भारत लौटे। इसके बाद उनका स्थानांतरण हावड़ा हुआ, लेकिन पाँच महीने बाद वे गया आ गए, जहाँ उन्होंने पाँच वर्षों तक कार्य किया। गया में रहते हुए वे दो बार हिंदी ऑनर्स परीक्षा के परीक्षक बने—पहली बार सह-परीक्षक और दूसरी बार संयुक्त परीक्षक। उस समय उनके साथ डॉ. ए. एफ. रूडाल्फ हॉर्नली भी थे।
1892 से 1896 तक वे हावड़ा में कार्यरत रहे। 1894 में उन्होंने जेनेवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ओरिएंटलिस्ट कांग्रेस के दसवें अधिवेशन में बंगाल सरकार, बंगाल एशियाटिक सोसायटी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। 1895 में वे बिहार अफीम एजेंट के रूप में बाँकीपुर (पटना) आ गए।
1897 में वे लंबी छुट्टी पर चले गए और उसी दौरान उन्हें भारतीय भाषा सर्वेक्षण का सुपरिटेंडेंट नियुक्त किया गया। हालांकि, तब तक उनका स्वास्थ्य काफी बिगड़ चुका था, इसलिए वे शिमला चले गए। भाषा सर्वेक्षण का अधिकांश कार्य उन्होंने शिमला में रहकर किया। नवंबर 1899 में वे इंग्लैंड लौट गए और तीन वर्ष बाद बंगाल सरकार की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वे अपने निवास स्थान राथफार्नहम, डबलिन (आयरलैंड) चले गए, जहाँ उन्होंने 8 मार्च 1941 को अंतिम सांस ली।
बिहार से ग्रियर्सन का आत्मीय संबंध
ग्रियर्सन का बिहार से विशेष लगाव था। विदेशी होने के बावजूद वे इतनी धाराप्रवाह भोजपुरी बोलते थे कि लोग अचंभित रह जाते थे। बिहार से उनके गहरे संबंधों का प्रमाण यह है कि भारत छोड़ने के बाद भी उन्होंने अपने खान-पान में बिहारी भोजन, विशेष रूप से चूड़ा-दही, को शामिल किए रखा।
सबसे पहले उन्होंने ही भोजपुरी बोलने वाले लोगों के लिए ‘भोजपुरिया’ शब्द का प्रयोग किया था। भोजपुरी के प्रति उनके प्रेम को उनके लिखे इन शब्दों से समझा जा सकता है—
“कस-कस कसगर केना मगहिया,
का भोजपुरिया, का तिरहुतिया!”

ग्रियर्सन का भाषा प्रेम
ग्रियर्सन का मानना था कि प्रशासनिक अधिकारियों को जिस क्षेत्र में कार्य करना हो, वहाँ की भाषा का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। बंगाल में रहने के दौरान उन्होंने बंगला सीखी, और चूंकि बंगाल प्रेसिडेंसी एक बहुभाषी क्षेत्र था, इसलिए बिहार में रहते हुए उन्होंने भोजपुरी और मैथिली भी सीख लीं। उनकी नियुक्ति जिन क्षेत्रों में हुई, वहाँ वे आम जनता से निकट संपर्क में थे। स्थानीय भाषाओं के ज्ञान का सबसे बड़ा लाभ यह था कि इससे प्रशासनिक अधिकारियों और जनता के बीच संवाद आसान हो जाता था।
ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय भाषाओं के अध्ययन पर विशेष ध्यान दिया जाता था। ग्रियर्सन सहित कई ब्रिटिश अधिकारियों ने भारतीय भाषाओं में दक्षता हासिल की। यदि यह परंपरा स्वतंत्रता के बाद भी जारी रहती, तो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक सशक्त सांस्कृतिक सेतु बन सकता था। किसी हिंदी भाषी प्रदेश में कार्यरत तमिल अधिकारी को तमिल और हिंदी दोनों का ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि तमिल और हिंदी प्रदेशों के आपसी संवाद की भाषा हिंदी होनी चाहिए, न कि अंग्रेज़ी।
ग्रियर्सन के भाषा सर्वेक्षण और उनके विभिन्न लेख अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुए, जिससे अंग्रेज़ी साहित्य समृद्ध हुआ। वे सौ से अधिक भाषाओं के ज्ञाता थे और यदि चाहते तो हिंदी में भी अपना काम कर सकते थे। इससे वे भारतीय भाषाओं और समाज को और अधिक गहराई से समझ पाते। फिर भी, उन्होंने अंग्रेज़ी में कार्य करके भारतीयों को अपनी भाषाओं से प्रेम करना सिखाया।
भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण एक अत्यंत कठिन कार्य था, लेकिन ग्रियर्सन ने इसे केवल भाषा-संग्रह तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र की बोली का व्याकरण प्रस्तुत किया। अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से संकलित किए गए भाषा-नमूनों के हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ उन्होंने उस क्षेत्र का संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय भी दिया। उनके भाषा सर्वेक्षण में संकलित बोलियों और भाषाओं के व्याकरण से न केवल भाषायी संरचना, बल्कि उस क्षेत्र की जनसंख्या, प्रवासन और सामाजिक संरचना की जानकारी भी प्राप्त होती है।
ग्रियर्सन का भाषा-सर्वेक्षण भारतीय भाषाओं का ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज और उसके ऐतिहासिक विकास का भी दस्तावेज़ है। उन्हें संस्कृत साहित्य का गहरा ज्ञान था। उनके गुरु प्रो. एटकिंसन संस्कृत के विद्वान होने के साथ-साथ लैटिन, अंग्रेज़ी, रूसी और चीनी भाषाओं के भी विशेषज्ञ थे। वे डबलिन के ट्रिनिटी कॉलेज में प्राध्यापक थे, जहाँ ग्रियर्सन ने 1868 में अध्ययन किया। ग्रियर्सन के भाषा-सर्वेक्षण में उनके गुरु एटकिंसन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
संदर्भ
Aruṇa Kumāra , Grierson : Bhasha Aur Sahitya Chintan

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।