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औरतों से हिंसा के पीछे की क्या है सोच

स्त्रीवादी आंदोलनों की प्रमुख आवाज़ ग्लोरिया स्टायनेम ने पितृसत्तात्मक हिंसा को सभी हिंसाओं की जड़ माना। पूरी सामाजिक व्यवस्था ही स्त्री के लिए दमनकारी है……

ग्लोरिया स्टायनेम

दुनिया का पहला वर्ग विभाजन था स्त्री और पुरुष के बीच।सबसे पहले श्रम को लैंगिक आधार पर बांटा गया। घरेलू औरत और मेहनतकश आदमी कहते वक्त किसी ने सोचा नहीं कि घर में रहने वाली भी मेहनतकश ही तो है! धोना-पकाना-पीसना-सीना-पिरोना-बुनना-पालना-पोसना; असंख्य काम थे, जिन्हें किसी सत्ता ने कमतर बना दिया और बाहर रहने वाले पुरुष के कामों को जरूरी। यहीं से शुरु होता है एक जेंडर का दूसरे पर मालिक की तरह अधिकार समझना, दमन, शोषण और हिंसा करना। जिसने बाहर की दुनिया को जीता, उसने घर के प्राणियों को भी जीती हुई वस्तु समझ लिया।

इस लैंगिक श्रम-विभाजन का आधार था यह तर्क कि स्त्री-पुरुष के प्रकृति ने ही अंतर किया है। स्त्री को मन और देह से दुर्बल बनाया है और पुरुष को मजबूत व साहसी। साहस की व्याख्या पौरुष से होने लगी और वीरता की अभिव्यक्ति युद्धों से। ’वीर भोग्या वसुंधरा‘ जो वीर है धरती के सुखों को वही भोगेगा। उसी के लिए स्त्री और प्रकृति का अस्तित्व है।

अमेरिका में स्त्रीवादी आंदोलनों की प्रमुख आवाज़ और प्रमुख स्त्रीवादी ग्लोरिया ने इस पितृसत्तात्मक हिंसा को दुनिया में सभी हिंसाओं की जड़ माना है। एक पत्रकार की तरह जोखिम भरे करियर से शुरू करते हुए ग्लेरिया ने महसूस किया कि पूरी समाजिक व्यवस्था स्त्री के लिए किस तरह दमनकारी बना दी गई है। वह न्यूयार्क मैंगजीन की फाउंडिग सदस्य रहीं। इसी के परिशिष्ट के तौर पर उन्होंने मिस(Ms.) पत्रिका की शुरुआत की, जो एक स्त्रीवादी पत्रिका थी। उन्होंने देखा कि महिलाओं के लिए जो मैगजीन छप रही थीं, वो सिर्फ उन्हें अच्छी गृहिणी बनाने की सामग्री पेश कर रही थीं। जो औरतें सड़को पर आंदोलन कर रही थीं, उन्हीं में से बेट्टी फ्रीडन, केट मिलेट और ग्लोरिया स्टायनेम जैसी कुछ स्त्रीवादियों ने लेखों, किताबों, पत्रिकाओं के माध्यम से जगरूकता लाने की कोशिश की। वे आंदोलनों में भी थीं और किताबें भी लिख रही थीं। जरूरी थी कि पितृसत्तात्मक संरचना की आलोचना की जाए और उन तरीकों को समझा जाए, जिनसे यह व्यवस्था काम करती है। जैसे कि, बल प्रयोग। हिंसा।

महिलाओ के साथ हिसा

स्टायनेम कहती हैं कि कोई राष्ट्र अपने आप में हिंसक है या नहीं, या क्या वह किसी अन्य देश के खिलाफ सैन्य हिंसा का उपयोग करेगा, यह गरीबी और कुदरती संसाधनों पर कब्जे की  ललक या धर्म नहीं तय करता, न ही लोकतांत्रिक होना यह तय करता है। यह तय होता है महिलाओं के खिलाफ हिंसा से या कहें महिलाओं पर दबदबे से।

इसे समझने के लिए उस असल चीज को समझना होगा जो पितृसत्ता की जड़ में है-श्रेष्ठता बोध, जिससे ’एनटाइटलमेंट‘ पैदा होता है। मैं श्रेष्ठ हूं, इसलिए अधिक हकदार हूं। आप पाएंगे कि हर तरह की हिंसा की जड़ में यहीं सोच है। हर तरह की हिंसा की जड़ में यहीं सोच है। इसी पर वे सारी संस्थाएं बनी हैं, जिनमें सभी जेंडर के लोगों को श्रेणियों में बांटा गया है और कम-ज्यादा अधिकार दिए गए या अधिकारों से वंचित किया गया। गौर से देखिए तो जाति, नस्ल, धर्म का श्रेष्ठता बोध भी असल में स्त्री की कोख और यौनिकता के नियंत्रण के बिना संभव नहीं है। रक्त की शुद्धता और भेद-भावपूर्ण आइडिया बिना स्त्री की कोख और मन को कैद किए कैसे संभव होता! प्रेम करने का नतीजा आंनर किलिंग में मिला। इसी से समझिए कि पितृसत्तात्मक हिंसा की शिकार सिर्फ औरतें ही नहीं हुई। वे पुरुष भी हुए जिन्होंने जाति, नस्ल, धर्म की हायरार्की को तोड़ने की गुस्ताखी की। वे पुरुष भी जो पितृसत्तात्मक पैमानों पर मर्द साबित नहीं हुए और वो स्त्रीयां भी जो पितृसत्तात्मक पैमानों पर स्त्री साबित नहीं हुई।

पितृसता (Patriarchy) का गढ़ है परिवार, जो शादी से बनता है, यानी स्त्री-पुरुष के साथ आने से। इसमें स्त्री का दोयम दर्जा आरंभ से तय है और पुरुषों की हकदारी भी। घरेलू स्तर पर ही पितृसत्तात्मक हिंसा की शुरुआत हुई और इसका असर तमाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक संस्थाओं तक फैलता गया। बराबरी की दुनिया और सामाजिक समरसता पितृसत्तात्मक हिंसा को मिटाए बिना संभव नहीं।

बाबा साहब आंबेडकर का कहा याद रखना चाहिए। मैं एक देश की तरक्की को वहां की स्त्रियों की तरक्की से मापता हूं।

(नोट: स्त्रीवादी लेखिका सुजाता दिल्ली विश्वविद्यालय में असोसिएट प्रोफेसर है और यह लेख उन्होंने नवभारत टाइम्स हिंदी के सहभागी कालम में लिखा है, आभार नवभारत टाइम्स हिंदी और सुजाता।)

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