BusinessFeatureFoodSocietySwad Gali

“सत्तू: गर्मी में सेहत का साथी”

गर्मी में राहत पाने और सेहतमंद रहने के लिए सत्तू सबसे बढ़िया विकल्प है। जानें सत्तू के फायदे, इसे बनाने का तरीका और इसके विभिन्न प्रकार।

तपती गर्मी सभी को अपनी चपेट में लेने को तैयार है। लोग धीरे-धीरे पसीने से तरबतर हो रहे हैं और थकान से चूर हो रहे हैं। पंखे, कूलर और एसी जैसी चीजों की मांग फिर से बढ़ने लगी है, क्योंकि लोग गर्मी से राहत पाने के लिए तरह-तरह के उपाय अपना रहे हैं। हर कोई अपने-अपने तरीके से इस चिलचिलाती गर्मी से बचने की कोशिश कर रहा है।

उत्तर भारत में लोग गर्मी से राहत पाने के लिए सत्तू का सेवन करना पसंद करते हैं। इसमें प्रोटीन और कैल्शियम भरपूर मात्रा में होते हैं, साथ ही यह आसानी से पचने वाला होता है। गर्मी के इस मौसम में सत्तू के फायदों को समझना जरूरी है, क्योंकि उत्तर भारत के बड़े हिस्से में इसे न सिर्फ खाया, बल्कि पिया भी जाता है।

बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लोगों के जीवन में गहराई से जुड़ा सत्तू एक प्रोटीन से भरपूर आहार है, जो न केवल आसानी से पचता है, बल्कि शरीर को ठंडक भी प्रदान करता है। यही वजह है कि गर्मी के मौसम में अधिकांश लोग इसका सेवन करना पसंद करते हैं। खासतौर पर दूर-दराज के गांवों और कस्बों में इसे ‘गरीबों का भोजन’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह सस्ता, पौष्टिक और ऊर्जा देने वाला होता है।

सत्तू क्या है और कैसे बनता है?

सत्तू दरअसल एक सूखा चूर्ण होता है, जिसे बालू में भूने गए चने, मकई या जौ को आटा चक्की या जतसार में पीसकर तैयार किया जाता है। खाने-पीने के लिहाज से इसे कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है।

इसे पानी में घोलकर नमक या शक्कर मिलाकर पी सकते हैं, या फिर नमक, पानी, प्याज और हरी मिर्च के साथ आटे की तरह गूंधकर खा सकते हैं। इसके अलावा, सत्तू को आटे में भरकर लिट्टी बनाई जाती है, जिसे गरमागरम बैंगन-टमाटर की चटनी के साथ खाने का मजा ही कुछ और होता है। हर रूप में सत्तू का स्वाद बेहतरीन और लाजवाब होता है।

सभी आर्य भाषाओं में मिलता है सत्तू शब्द का प्रयोग

सत्तू शब्द की जड़ें संस्कृत के ‘सक्त’ या ‘सक्तकः’ शब्द में निहित हैं, जिसका अर्थ होता है – अनाज को भूनने के बाद पीसकर बनाया गया आटा। भारत की लगभग सभी आर्य भाषाओं में इस शब्द का प्रयोग देखने को मिलता है। पाली प्राकृत में इसे सत्तू, प्राकृत और भोजपुरी में सतुआ, कश्मीरी में सोतु, कुमाऊँनी में सातु – सत्तू, पंजाबी में सत्तू, सिंधी में सांतू, गुजराती में सातु और हिंदी में सत्तू या सतुआ कहा जाता है।

प्राचीन भारत में खान-पान में जौ का प्रचलन अधिक था, लेकिन जब गेहूं का उपयोग बढ़ा, तो जौ का सत्तू के रूप में अधिक इस्तेमाल होने लगा। बाद में धीरे-धीरे चना और मकई के सत्तू का भी प्रचलन बढ़ा।

संस्कृत में ‘सक्तक’ शब्द का निर्माण या संज् धातु में क्तिन् प्रत्यय जोड़ने से हुआ है, जिसका अर्थ होता है – जुड़ना, मिलना, संयुक्त होना या संलग्न होना। इसके अलावा, इसमें जकड़ना, चिपकना, संपर्क में आना जैसे भाव भी निहित होते हैं। सत्तू की प्रकृति भी इसी सिद्धांत पर आधारित है, क्योंकि इसे बनाने की प्रक्रिया में दो या दो से अधिक अनाजों को मिलाकर भूनने और पीसने के बाद एकसार किया जाता है। यही कारण है कि सत्तू शब्द न केवल एक पारंपरिक भोजन को दर्शाता है, बल्कि इसकी ऐतिहासिक और भाषायी जड़ें भी भारतीय संस्कृति में गहराई से समाहित हैं।

कई तरह से उपयोगी है सत्तू

महंगे शीतल पेय पदार्थों की तुलना में सत्तू न केवल स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह जेब पर भी भारी नहीं पड़ता। यह हर वर्ग के लोगों के बजट में आसानी से फिट होने वाला पोषक आहार है। खास बात यह है कि सत्तू बनाने की प्रक्रिया भी बेहद सरल है। इसके लिए चना, जौ, गेहूं या मकई को कुछ घंटे पानी में भिगोने के बाद बालू में हल्का भून लिया जाता है। फिर उसका छिलका हटाकर उसे पिसवा लिया जाता है, और इस तरह सत्तू तैयार हो जाता है।

सत्तू को ठोस और तरल दोनों ही रूपों में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही नहीं, इससे कई स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाए जा सकते हैं, जैसे – सत्तू की कचौड़ी, सत्तू का परांठा, सत्तू के लड्डू और सत्तू का मीठा या नमकीन शर्बत।

गर्मियों में खासतौर पर लोग चने के सत्तू को पानी, काला नमक, भूना हुआ जीरा पाउडर और नींबू के साथ घोलकर पीना अधिक पसंद करते हैं, क्योंकि यह न सिर्फ शरीर को ठंडक देता है, बल्कि ऊर्जा से भी भरपूर रखता है।

बीमारियों से राहत दिलाने में है कारगर

सत्तू का सेवन विशेष रूप से गर्मी के मौसम में पेट संबंधी कई समस्याओं के लिए बेहद फायदेमंद साबित होता है.

  • गर्मी के दिनों में सत्तू का सेवन करना गर्मी के दुष्प्रभाव एवं लू की चपेट से बचाता है. यह शरीर में ठंडक पैदा करता है . • सत्तू आसानी से पचने वाला भोजन है. यह शरीर में ऊर्जा की कमी होने पर तुरंत उसकी पूर्ति करता है.
  • सत्तू खाने या पीने से लंबे समय तक भूख नहीं लगती. इस तरह यह वजन कम करने में मदद करता है.
  • मधुमेह रोग तथा मोटापे से निजात दिलाने में सत्तू फायदेमंद है. एनीमिया के मरीजों को भी रोजाना सत्तू के शर्बत सेवन से लाभ मिलता है.
  • चने के सत्तू में मिनरल्स, आयरन, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस पाया जाता है जो आपके शरीर की थकान मिटाकर आपको इंस्टेंट एनर्जी देने का काम करता है.
  • सतू प्रोटीन का बढ़िया स्त्रोत है. यह कब्ज, एसीडिटी, गैस, अपच सहित पेट की तमाम समस्याओं को ठीक करने में भी सहायक है.
  • ब्लडप्रेशर के मरीजों के लिए सत्तू का सेवन काफी लाभदायक है. यह लीवर को मजबूत बनाता है.

विदेशी भी हैं सत्तू के गुणों पर फिदा

जी हां… सत्तू के स्वाद और सेहतमंद गुणों के दीवाने सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी मौजूद हैं। दक्षिण कोरिया के शहर चुनचिन की निवासी ग्रेस ली भी उन्हीं में से एक हैं। करीब 20 साल पहले बिहार आकर बसने वाली ग्रेस ली पहले खुद सत्तू की दीवानी हुईं और फिर उन्होंने अपने कोरियाई दोस्तों को भी इसका स्वाद चखाया, जिससे वे भी इसके मुरीद हो गए।

ग्रेस ली के परिवार का बिहार से जुड़ाव उस वक्त शुरू हुआ, जब उनके पति यांज ली उच्च शिक्षा के लिए पटना आए। वर्ष 1997 में यांज ली से शादी के बाद ग्रेस भी पटना आ गईं। यहां आकर उन्होंने हिंदी भाषा सीखी और पटना विश्वविद्यालय से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की।

इस दौरान उन्हें बिहार की संस्कृति को नजदीक से समझने और अपनाने का अवसर मिला, जिससे वे बेहद प्रभावित हुईं। वे खुद मानती हैं कि अब वे “आधी बिहारी” बन चुकी हैं। वर्तमान में वे पटना के एएन कॉलेज और हाजीपुर के एनआईटी महिला कॉलेज में कोरियाई भाषा पढ़ाती हैं।

सत्तू से बदली लाइफस्टाइल

वर्ष 2005 में ग्रेस ली और उनके पति को कुछ स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हुईं। तब उनके एक बिहारी मित्र ने सत्तू पीने की सलाह दी। ग्रेस बताती हैं,
“हमने रोज़ सुबह नाश्ते में सत्तू पीना शुरू किया, और नतीजा बहुत शानदार रहा। मैं खुद को ज्यादा एक्टिव और एनर्जेटिक महसूस करने लगी, और मेरे पति की पेट से जुड़ी समस्याएं भी पूरी तरह दूर हो गईं।”

सत्तू के प्रचार-प्रसार का उठाया जिम्मा

सत्तू के सेहत पर पड़ने वाले जबरदस्त प्रभावों को देखते हुए उन्होंने अपने दूसरे कोरियाई दोस्तों को भी इसका स्वाद चखाने का निर्णय लिया। करीब 20 लोगों की मदद से सत्तू तैयार कर दक्षिण कोरिया और भारत में रहने वाले अपने कुछ कोरियाई मित्रों को भेजा। वहां भी लोगों को यह इतना पसंद आया कि धीरे-धीरे सत्तू की मांग बढ़ने लगी

जब ऑर्डर बढ़ने लगे, तो पटना स्थित अपने घर से इसकी आपूर्ति करना मुश्किल हो गया। तब दिसंबर 2015 में ग्रेस ली ने हाजीपुर में अपना खुद का सत्तू का कारखाना स्थापित कर लिया।

अब बड़े पैमाने पर हो रही सप्लाई

आज ग्रेस ली हर साल 40 किलो सत्तू दक्षिण कोरिया और दो क्विंटल सत्तू भारत में रहने वाले अपने कोरियाई दोस्तों को बेचती हैं। पहले इस काम में सिर्फ उनके पति ही मदद करते थे, लेकिन जब ऑर्डर बढ़ने लगे, तो उनके कोरियाई-अमेरिकी मित्र जॉन डब्लू चे और विलियम आर कुमार भी इस बिजनेस से जुड़ गए। ये लोग GBM Networks Asia Pvt. Ltd. के तहत काम कर रहे हैं।

ग्रेस के इस प्रयास से 40-50 स्थानीय महिलाओं को उनके सत्तू कारखाने में रोजगार भी मिला है। बिहार की संस्कृति में पूरी तरह घुल-मिल चुकीं ग्रेस ली गर्व से कहती हैं –
“अब मैं आधी बिहारन बन चुकी हूं।”

आभार, प्रभात खबत सुरभि, यह लेख प्रभात खबर के सुरभि परिशिष्ट में प्रकाशित हो चुकी है।

rachana priyadarshini

16 वर्षों से लेखन एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय. देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेखन का अनुभव; लाडली मीडिया अवॉर्ड, NFI फेलोशिप, REACH मीडिया फेलोशिप सहित कई अन्य सम्मान प्राप्त; अरिहंत, रत्ना सागर, पुस्तक महल आदि कई महत्वपूर्ण प्रकाशन संस्थानों सहित आठ वर्षों तक प्रभात खबर अखबार में बतौर सीनियर कॉपी राइटर कार्य अनुभव प्राप्त करने के बाद वर्तमान में फ्रीलांसर कार्यरत.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Translate »
“गर्मी में सेहत का साथी – पिएं सत्तू, रहें फिट और कूल!” एंडोमेट्रियोसिस – एक अनदेखी बीमारी चुप्पी तोड़ो, मदद लो! “महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य: अनदेखा न करें!” प्रेम क्या है…