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“गर्भपात का नया कानून पितृसतात्मक चरित्र पर थप्पड़ सरीखा है”

प्रतीकात्मक तस्वीर

बीते दिनों देश की सर्वोच्च अदालत ने महिलाओं के मानवाधिकार के पक्ष में एक और अधिकार नथ्थी कर दिया, वह है गर्भपात का अधिकार लेकिन देश में संपूर्ण आधी अबादी इस अधिकार का उपयोग अपने हक में कर सके, इसका सफर अभी बहुत लंबा है।

गर्भपात का अधिकार और महिलाएं

अशिक्षा, जागरूकता और स्वयं अपने देह पर अधिकार जैसे सवाल गर्भपात के अधिकार के रास्ते में पड़े वो पत्थर है जो इस अधिकार को समग्रता मे सफल होने नहीं देगे। वह महिला जो मानसिक रूप से इतनी सशक्त है कि वे स्वेच्छा से यह निर्णय ले सके तो सर्वोच्च अदालत का फैसला उसके के लिए सहयोगी और राहत भरा हो सकता है।

गर्भपात का अधिकार का हाल भी महिलाओं को मिले अन्य संवैधानिक अधिकार की तरह न हो जाए इसके लिए पूरी आधी-आबादी को एक नहीं कई मोर्चों पर अपनी लड़ाई स्वयं बुलंद करनी होगी, फिर चाहे वह शिक्षा का अधिकार हो, समानता का अधिकार हो या स्वतंत्रता का अधिकार हो या अन्य कोई भी मौलिक अधिकार! जो देश के संविधान ने महिलाओं के समग्र विकास के हक में दिए है। उसकी यथास्थिति यही बताती है कि महिलाओं के मुक्ति का सफर अभी लंबा है।

स्त्री-देह के स्व-अधिकार से जुड़ा फैसला

यौन स्वतंत्रता, निजता और गरिमा जैसे सवालों की अपनी व्याख्या गर्भपात के नये कानूनी पहल के साथ है। अच्छी बात यह है कि सर्वोच्च अदालत ने अपनी व्याख्या में मैरिटल रैप को भी शामिल करते हुए उसे अपराध माना है। शादी के बाद महिला की मर्ज़ी के खिलाफ शारीरिक संबंध को रेप की श्रेणी में रखा जाएगा, हालांकि मैरिटल रेप की व्याख्या अभी अधूरी है।

सर्वोच्च अदालत ने भारतीय महिलाओं के गर्भपात के अधिकार पर कहा कि ” सभी महिलाओं को सुरक्षित और कानूनी गर्भपात का अधिकार है। किसी महिला को उसकी वैवाहिक स्थिति के कारण अनचाहे गर्भ गिराने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।“ साथ ही साथ सवोच्च अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिंगल और अविवाहित महिलाओं को गर्भावस्था के 24 सप्ताह तक मेडिकल टर्मिनेशन आंफ प्रेग्नेंसी एक्ट एंड रुल्स के तहत गर्भपात का अधिकार है।

पितृसतात्मक चरित्र पर फैसला थप्पड़ सरीखा

सर्वोच्च अदालत का मौजूदा फैसला गर्भपात को लेकर समाज के पितृसतात्मक चरित्र पर झन्नाटेदार थप्पड़ सरीखा है, जो एक तरह गर्भपात को पाप भी कहता है और दूसरी तरह मादा भ्रूण के गर्भपात पर सही करता है।

76 साल के लोकतांत्रिक देश को इस दिशा में सोचने की आवश्यता है कि कोई भी समाज महिलाओं की समानता और स्वतंत्रता के हक के कोई सवाल अपने प्रयासों से क्यों नहीं सुलझा पाता है? परंपरा और मर्यादा का दामन थामे हुए समाज कुंठाओं से भरी नैतिकता को रिसाइकल बीन में क्यों नहीं डालता है ?

महिलाओं की तमाम उपलब्धियों और सफलता पर झूम कर इतराने वाला पुरुषवादी समाज महिलाओं के मौलिक हक की खुदमुख्तारी स्वयं क्यों नहीं करता है? जिस भारतीय समाज में औपनिवेशिक दौर में समाज-सुधारकों के लंबी फौज ने महिलाओं के हक के दिशा में कई महत्वपूर्ण सवालों न केवल समय-समय पर उठाया, उसका लोकतांत्रिक समाधान भी खोजा। वह समाज आज सर्वोच्च अदालत के दखल के बाद ही महिलाओं के अधिकार मिलने के बाद ताली बजाने क्यों चला आता है?

समय के साथ गतिशील या बदलते रहने वाला समाज, आधुनिकता के भाग-दौड़ और बाज़ार के चका-चौध में भी महिलाओं के हक के फैसले लेने में ठिठक क्यों जाता है?

जाहिर सी बात है आधुनिकता के आंधी और परंपरा के दबाव में जीने वाला खंडित मन महिलाओं के स्वतंत्र चेतना और अस्तित्व को स्कीकार्य करने में अभी भी सहज़ नहीं है। आधुनिकता और परंपरा के बीच में फंसा उसका  द्वंद अपनी सुविधा के अनुसार नियंत्रित और अनुशासित करना चाहता है। उसका यहीं द्वंद हर महिला के समानता और स्वतंत्रता का बाधक बन जाता है। खंडित मानसिकता का यह द्वंद जब तक अपनी सामाजिक और सांस्कॄतिक दासता से मुक्त नहीं हो जाता, महिलाओं के हक में बनाए गए तमाम अधिकार और संवैधानिक उपाए, ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होगे।

Pratyush Prashant

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।

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