गांधी की “तूफ़ानी” और टैगौर की “मिनु” – मालती नवकृष्ण चौधरी


महात्मा गांधी उन्हें “तूफ़ानी” कहा करते थे और रवीन्द्रनाथ टैगौर की प्रिय “मिनु” थी, मालती नवकृष्ण चौधरी। साहस, हमेशा गतिशील रहने वाली , दमित और वंचित लोगों के अधिकार के लिए सज़ग, खरीखरी एकदम स्पष्ट बोलने वाली, सच बोलने से कभी नहीं डरने मालती नवकृष्ण चौधरी।
बह्मसमाजी बैरिस्टर पिता कुमुदनाथ सेन के घर पैदा हुई मालती सेन का लालन-पालत मां स्नेहलता सेन के सरंक्षण में हुआ क्योंकि पिता जल्दी चल बसे। मां का माईका भरा-पुरा समृद्ध परिवार था सभी बड़े सरकारी पदों पर कार्यरत थे। मां स्नेहलता ने टैगोर के कुछ कृतियों का अनुवाद किया था जिसका जिक्र उनकी पुस्तक “जुगलबंदी ” में मिलता है।
मां स्नेहलता बताती है कि – मालती पर टैगोर और महात्मा गांधी दोनों का गहरा प्रभाव था। टैगोर के सरक्षण में उन्होंने कला, शिक्षा, विकास और संस्कृति को समझा और उसके मूल्यों के बारे में जाना और गांधीजी के चमत्कारी प्रभाव से मालती आजादी के लड़ाई में कूद पड़ी।

शांतिनिकेतन में शिक्षा, विवाह
1921 में सोलह साल की उम्र में शांतिनिकेतन आई और छह साल तक रही। जहां श्री एमहसर्ट नामक अंग्रेज से खेती-बागवानी, श्री पियर्सन से अंग्रेजी, आदिवासी कल्याण, कु. स्टेला क्रेमिस्ख से भारतीय कला, नृत्य सिद्धांत और गुरुदेव से कविता साहित्य के बारे में शिक्षित हुई।

इन्हीं दिनों नवकृष्ण चौधरी भी शांतिनिकेतन अध्ययन के लिए आए। जिससे 1927 में मालती का विवाह तय हुआ और मालती शांतिनिकेतन से उड़ीसा मालती चौधरी बनकर आईं। उड़ीसा के छोटे से गांव अनखिया में दोनों रहने लगे और गांव के विकास और सशक्तिकरण के लिए कार्य करने लगे।
आजादी और स्वतंत्र भारत में भी सक्रिय
नमक-सत्याग्रह शुरू होते ही दोनों इस लड़ाई में कूद पड़े। जेल गए और जेल में ही जेल बंदियों को पढ़ाने का काम करने लगे। 1933 में दोनों ने मिलकर भारतीय कांग्रेस समाजवादी दल की उड़ीसा प्रातीय शाखा का गठन किया।
स्वतंत्रता के पश्चात संविधान सभा के सदस्या के रूप में मालती चौधरी ने ग्राम विकास के लिए प्रौढ़ शिक्षा की भीमिका पर अधिक बल दिया। 1951 में नवकृष्ण चौधरी उड़ीसा के मुख्यमंत्री बने, तब मालती अनुसूचित जातियों और आदिम जातियों के लिए काम कर रही थीं। उन्होंने राजनीति से अलग रहते सामाजिक एक्टिविस्ट के तरह काम करना तय किया।
भारत सरकार से कई सम्मान प्राप्त कर चुकी मालती देवी के व्यक्तित्व को केवल बाजी राउत छात्रावास, उत्कल नवजीवन मंडल या अंगुल के समीप चंपातिमुंडा के उत्तर बुनियादी स्कूल के स्थापना से नहीं समझा जा सकता है। मालती देवी ने स्वतंत्रता आंदोलन के अंग के रूप में गरीबों के शोषण कर रहे जमीदारों, भू-स्वामियों तथा साहूकारों के विरुद्ध कृषक आंदोलन का संगठन भी किया था, वह विनोबा के भू-दान आंदोलन में भी सक्रिय रहीं। आपातकाल के दौरान सरकारी नीतियों का विरोध करने के कारण जेल में भी डाल दी गयीं।

93 वर्ष में गाथा पूर्ण जीवन जीने के बाद उनका निधन 15 मार्च 1998 को हुआ। मालती चौधरी वह महिला थीं, जो महात्मा गांधी को भी गलत होने पर स्पष्ट शब्दों में कह देती थीं, “बापू आपने सही नहीं किया।” और महात्मा गांधी उनसे क्षमा मागने के लिए हाथ जोड़कर खड़े हो जाते थे।

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।