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घरों के अंदर क्यों बंद नहीं होती महिलाओं से हिंसा

सुरक्षित जीवन का मतलब सिर्फ रोटी, कपड़ा, मकान नहीं गरिमापूर्ण तरीके से जीवनयापन कर सकना और बराबरी से घर के जरूरी मामलों में शरीक हो सकना भी है…

यह एक बड़ा सवाल है कि क्या हमारे घर लैंगिक हिंसा से मुक्त हैं? क्योंकि हम जब भी लैंगिक हिंसा की बात करते हैं, तब हमारा इशारा घर के बाहर की दुनिया की ओर ही होता है। जमाना खराब है। देर रात तक बाहर रहना ठीक नहीं है। ऐसी नौकरी करना ठीक नहीं। ऐसे लोगों से मिलना ठीक नहीं।

तमाम हिदायतें घर से बाहर कदम रखने पर दी जाती हैं। लेकिन क्या कभी हम अपने परिवारों के भीतर स्त्रियों से हिंसा पर बात करते हैं? या क्या हम कभी लड़कियों को घर के भीतर जेंडर्ड हिंसा के बरे में जागरूक करते हैं? हिदायतें देते हैं?

यह सोचना एक झटके में तो हैरान करता है कि औरतों के खिलाफ अपराध घर में? लेकिन यह भी तो सच है कि सती-प्रथा, बाल-विवाह, विधवाओं के साथ अमानवीय व्यवहार, जबरन केश-मुंडन जैसी कितनी ही जेंडर-आधारित हिंसाएं परंपराओं के नाम घरों में पहती रहीं, जिनमें से कुछ आज भी जीवित हैं।

इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि शादी को लड़कियों के लिए इसलिए जरूरी बताया जाता है क्योंकि यह माना जाता है कि घर-परिवार ही उसे सामाजिक सुरक्षा दे सकते हैं। यह चिराग तले अंधेरे वाली बात है। इस पर कोई बात नहीं करना चाहता कि असल में कितनी लड़कियों को शादी के बाद सुरक्षित जीवन मिल पाता है।

सुरक्षित जीवन का मतलब सिर्फ रोटी, कपड़ा, मकान नहीं गरिमापूर्ण ढंग से जीवनयापन कर सकना और बराबरी से घर के जरूरी मामलों में शरीक हो सकना भी है। दहेज के मौखिक और शारीरिक प्रताड़ना के मामले भले ही समय के साथ कम हुए हों, घरेलू हिंसा के मामलों में कोई कमी नहीं आई  है।

महामारी के दौर में घरेलू हिंसा

राष्ट्रीय महिला आयोग की 4 अप्रैल 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, कोविड लांकडाउन के शुरुआती हफ्ते में ही घरेलू हिंसा की शिकायतें कई गुना बढ़ गई। उस दौरान मर्दो की नौकरियां चली गई, तनख्वाह का पता नहीं मिलेगी या नहीं, परिवार एकांत में धकेल दिए गए। ऐसी स्थिति में सारी चिंढ़ और हिंसा स्त्रियों पर निकाली गई। यूएन वुमन की वेबसाइट ने इसे शैडो पैंडेमिक बताया।

लांकडाउन ने महिलाओं से उनका एकांत छीन लिया। वे पल छीन लिए, जब वे कुछ पल सुस्ता सकती थीं। जिन घरों में सारा घरेलू श्रम स्त्री के हिस्से में ही आया, वहां काम के अतिरिक्त बोझ और फरमाइशों, अपेक्षाओं, शिकायतों ने स्त्रियों की कमर ही तोड़ दी। इसी के बीच जीवनसाथी द्वारा यौन-हिंसा, वैवाहिक बलात्कार को भी शामिल कर लें तो ये आंकड़े कई गुना बढ़ सकते हैं। 2020 में रिपोर्ट हुए बलात्कार के कुल मामलों में से 9.3% में रेपिस्ट घर का ही सदस्य था।

गर्भावस्था में दी जाने वाली मानसिक हिंसा या थोपी गई गर्भावस्था घर की संरचना के भीतर होने वाली हिंसा है। जन्म लेते ही लड़की को मार डालने के पाप से बचाते के लिए मानो गैर-कानूनी सोनोग्राफी अवतरित हो गई।

गर्भस्थ शिशु का लिंग पता लगाकर परिवार का गर्भपात के लिए दबाव डालना या जबरन गर्भपात करवा देना भी हमारे समाज का सच है। कितने बच्चे हों, कब हों, किस लिंग के हों, इन सब निर्णयों पर असल में कितनी स्त्रियों का अपना खुद का हक है?

लड़की की मां को कम पोषण और अधिकार दिया जाना है तो ये सब लैंगिक हिंसा के ही अलग-अलग रूप। घर अगर स्त्री के लिए एकमात्र सुरक्षा का दायरा है तो बड़ी उम्र तक अविवाहित रह गई बेटी सांवली लड़की, मां बनने में असमर्थ स्त्री, विकलांग स्त्री के लिए अपमान, ताने और खतरा हमारे घरों के भीतर कैसे प्रवेश पा जाते हैं?

घर वह मूल इकाई है, जिस पर समाज, देश, राष्ट्र आधारित हैं। जिस लिंग-भेदी संरचना की शिकायत हम बाहर की दुनिया से करते है उसका एक छोटा रूप हमारे घरों की जेंडर्ड संरचना है।

अपने व्यवहार और परवरिश में यह शामिल करना बेहद जरूरी है कि कोई भी घरेलू काम छोटा नहीं, न उसे करने वाली/वाला तुच्छ है और कोई भी बाहर कमाने का काम महान नहीं है। घर एक टीम है। इसके हर सदस्य का स्वास्थ्य, खुशी और आजादी मायने रखने रखती है।

नोट:- यह लेख सुजाता ने, नवभारत टाइम्स हिंदी के सहभागी कांल म के लिखा है..आभार सुजाता और नवभारत टाइम्स हिंदी……

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