बसंती देवी, नेताजी की दत्तक मां भी थी..

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय सेनानी थी। कई आंदोलनों में सक्रिय रही आजादी मिलने के बाद सामाजिक कार्यों में सक्रिय रही। सविनय अवज्ञा आंदोलन, खिलाफत आंदोलन और कांग्रेस के नागपुर सत्र जैसे आंदोलनों में सक्रिय रही। अपनी बहनों के साथ मिलकर नारी कर्म मंदिर में महिला कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण केंद्र बनाए।
असम राज्य के दिवान बराडनाथ हल्दार के घर जन्म हुआ, लोरेतो हाउस कोलकाता से पढाई की। सत्रह साल उम्र में चितरंजन दास से विवाह किया और तीन बच्चों की मां बनी। असहयोग आंदोलन में चितरंजन दास के साथ मिलकर खादी के कपड़े बेचने के लिए सड़कों पर उतर गई और अंग्रेजों को गिरफ्तार करने के लिए उसकाया। चितरंजन दास के गिरफ्तारी के बाद साप्ताहिक पत्रिका बंगलार कथा(बंगाल की कहानी) की प्रभारी बनी।

बसंती देवी साल भर बंगाल कांग्रेस की प्रभारी भी रही। चटगांव सम्मेलन में उनके भाषण ने आंदोलन के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। चूंकि चितरंजन दास सुभाष चंद बोस के राजनीतिक सलाहकार थे, इसलिए चितरंजन दार के मृत्यु के बाद बसंतीदेवी हमेशा अंग्रेजों के शक के दायरे में रही। सुभाष चंद बोस उनको अपनी दत्तक मां मानते थे।

आजादी के बाद बसंती ने सामाजिक कार्य को जारी रखा। कोलकता में पहला महिला विश्वविद्यायल जिसे सरकार से वित्त पोषित किया उसका नाम बसंती देवी महाविद्यायल रखा गया। उनको पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया।

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।