लघु-कथा

संत फ़रीद का सपना

सूफी संत फ़रीद ने एक रात सपना देखा। सपने में वह स्वर्ग जा पहुंचा। सारा स्वर्ग सजा-धजा था- रास्ते में फूल, इमारतों पर रोशनी की लड़िया, चारों तरफ नृत्य और संगीत। उनके पूछा- भाई क्या बात है? कोई उत्सव है क्या?, जवाब मिला,- आज परमात्मा का जन्मदिन है। हम ख़ुशियां मना रहे है।

लिहाजा फ़रीद एक पेड़ के नीचे जा खड़ा हुआ। सड़क पर एक लंबा जुलूस गुजरने लगा। जुलूस के आगे घोड़े पर बैठा आदमी चल रहा था। फ़रीद ने सवाल किया- भाई, ये महाशय कौन है? जवाब आया, इन्हें नहीं जानते? ये ही तो हजरत मोहमद है। पीछे लोगों का हुजूम उमड़ रहा था। फ़रीद ने पूछा- फिर ये लोग कौन हैं? जवाब मिला- ये लोग मोहम्मद के अनुयायी हैं। इन्हे मुसलमान कहते है।

पीछ-पीछे क्रूस हाथों में लिए लाखों ईसाइयों के साथ ईसा मसीह आए। उसके बाद अपने स्वर्ण रथ पर बैठे कृष्ण आए, धनुर्धारी राम आए। पीछे-पीछे नाचते-गाते भक्तों का मेला लगा हुआ था….

इसी तरह पैगंबर आते रहे, जय-जयकार करते जुलूस गुजरते रहे। सभी जुलूसों के गुज़र जाने के बाद अंत में गधे पर सवार एक बूढ़ा आदमी आता हुआ दिखाई दिया। उसके साथ कोई नहीं था। न को अनुगामी, न कोई साथी, वह अकेला चला आ रहा था। उसे देखकर फरीद को हंसी आ गई। फरीद ने उनसे पूछा- श्रीमान, आप है कौन? मोहम्मद, ईसा, राम, बुद्ध सभी को मैं पहचानता हूं। बिना किसी अनुयायी के इस तरह तो एक तमाशा लग रहे हैं आप।

उस बूढ़े ने उदास सी मुस्कान के साथ कहा- प्रिय मित्र मैं ही परमात्मा हूं। आज मेरा जन्मदिन हैं। लेकिन कुछ लोग ईसाई बन गए, कुछ मुसलमान, कुछ यहूदी, कुछ हिंदू..मेरे साथ चलने वाला कोई नहीं बचा।

चौककर फ़रीद जाग उठा। अगले दिन उसने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा, आज से मैं मुसलमान नहीं तहा। कल का सपना मेरे लिए एक इलहाम था। अब मैं किसी धर्म का अनुयायी नहीं हूं। मैं ख़ुद अपने रास्ते पर चलूंगा। मैं परमात्मा का अनुगमन करना चाहता हूं। कम से कम एक बंदा तो उसके साथ हो।

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