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सूर्य के साहचर्य का पर्व: मकर संक्रांति

हर घर की छत, मुंडेर, या खुले मैदान से आती “वो कांटा!”, “अरे पकड़ो!”, “ढ़ील दे!” जैसी मस्ती भरी आवाज़ें, तिल-गुड़ के लड्डुओं और चिक्की की मिठास भरी सोंधी खुशबू, तिलकुट का स्वाद, और पौष्टिक खिचड़ी के साथ घी-पापड़, दही, और अचार का संग। ठिठुरती ठंड के बाद खिलखिलाती धूप में साल का पहला पर्व “मकर संक्रांति” मनाने का आनंद ही कुछ और है। यह त्योहार न केवल प्रकृति के उपहारों का लुत्फ उठाने का अवसर है, बल्कि उसके प्रति आभार प्रकट करने का भी उत्सव है।

यह पर्व अपनी विविधता में अद्भुत है। कहीं इसे मकर संक्रांति कहा जाता है, तो कहीं पौष संक्रांति, पोंगल या लोहड़ी के रूप में भी मनाया जाता है।

जनवरी माह की 14 तारीख को मनाया जाने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन प्रायः बड़े-बुजुर्ग सुबह स्नान या गंगा स्नान करके दान-पुण्य करते हैं। बेशक यह एक मौसमी त्योहार है, जो सर्दी में राहत देने के साथ ही नई फसल की खुशी मनाने का सुअवसर प्रदान करता है। मकर संक्रांति के उत्सव के कई अन्य कारण भी हैं जो इसे खास बनाते हैं।

कंपकंपाती ठंड में राहत की उम्मीद

हिंदी में एक कहावत है: “माघ का जाड़ा बाघ।” इसका अर्थ है कि जिस तरह बाघ अपने हिंसक रूप में किसी को नहीं छोड़ता, उसी तरह माघ का जाड़ा जब चरम पर होता है, तो जानलेवा साबित हो सकता है। इस दौरान चलने वाली शीतलहर शरीर को ही नहीं, बल्कि हड्डियों तक को भेदने का अहसास कराती है।

जनवरी के इसी सर्द मौसम में, जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो वे दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाते हैं। इस खगोलीय घटना के साथ पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। यह दिन मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है।

सूर्य के एक गोलार्द्ध से दूसरे गोलार्द्ध की ओर यात्रा करने से सूर्य की किरणों में सकारात्मक और औषधीय प्रभावों का संचार होता है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। यह बदलाव कंपकंपाती ठंड में राहत की एक नई उम्मीद लेकर आता है।

कुछ अलग खाने-खिलाने का दिन: मकर संक्रांति

मकर संक्रांति का दिन भारतीय घरों में खान-पान के लिए खास होता है। इस दिन गुड़ का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। दाल-चावल और सब्जियों को मिलाकर बनाई गई खिचड़ी तो परंपरा है ही, लेकिन इसके साथ गुड़ और तिल के बने स्वादिष्ट लड्डू, मूंगफली और गुड़ की चक्की, और गजक जैसे पकवान भी अनिवार्य हैं।

भारत के अधिकांश हिस्सों में गन्ने की फसल आने के कारण गुड़ का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता है। यही वजह है कि मकर संक्रांति के कई पारंपरिक व्यंजनों में गुड़ का खास स्थान है। तिलकुट, रेवड़ी, दही-चिवड़ा, और खजूर के गुड़ से बने पीठ्ठे, इन सबमें गुड़ प्रमुख रूप से इस्तेमाल होता है।

इसके अलावा, कुछ जगहों पर घेवर और फीणी जैसे खास पकवान भी बनाए और खाए जाते हैं। खाने के इन अधिकांश व्यंजनों में गुड़ शामिल होता है, जिसकी तासीर गर्म होती है। यह शरीर को ठंड के दिनों में गर्माहट और संतुलन प्रदान करता है।

गुड़ और तिल से बने ये व्यंजन केवल मकर संक्रांति पर ही बनाए और खाए जाते हैं। सालभर इनका स्वाद नहीं लिया जाता, जो इस दिन को खास बनाता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को “कुछ अलग खाने-खिलाने का दिन” कहना पूरी तरह उचित है।

सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव

भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार, जब सूर्य दक्षिणायन में होता है, तो इसे देवताओं की रात्रि माना जाता है। वहीं, सूर्य के उत्तरायण होने के छह माह को देवताओं का दिन कहा गया है। दक्षिणायन को नकारात्मकता और अंधकार का प्रतीक तथा उत्तरायण को सकारात्मकता और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में सूर्योपासना का विशेष महत्व है।

सूर्य से मिलने वाले इन लाभों के कारण मकर संक्रांति के अवसर पर लोग सामाजिक जीवन के विभिन्न कार्यों को सूर्य के सान्निध्य में करना पसंद करते हैं। खुले आकाश के नीचे तिल-गुड़ का आनंद लेते हुए, मस्ती में झूमते हुए, और पतंगबाजी का लुत्फ उठाते हुए इस त्योहार को मनाया जाता है।

दक्षिणायन से उत्तरायण होते सूर्य के कारण न केवल ठंड से राहत मिलती है, बल्कि मौसमी परिवर्तन के साथ-साथ सूर्य के बढ़ते ताप से नई फसलों और वनस्पतियों में ऊर्जा और उष्मा का संचार होता है। सामाजिक जीवन और प्रकृति में होने वाले हर बड़े परिवर्तन के केंद्र में सूर्य का योगदान होता है।

इस प्रकार, मकर संक्रांति को न केवल आनंद और उल्लास का पर्व, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन भी कहा जा सकता है।

सुस्त जीवन में गति ला देती है पतंगबाजी

कड़कड़ाती ठंड से अकड़े और जकड़े हुए शरीर को गतिशील बनाने में पतंगबाजी बेहद कारगर साबित होती है। यह न केवल शरीर को सक्रिय रखती है, बल्कि रिश्ते-नाते, दोस्ती और परिचय में प्रगाढ़ता लाने का भी माध्यम बनती है।

पतंगबाजी के बहाने लोग खाने-खिलाने, हंसी-मजाक, और मूंगफली चटकाने जैसे साधारण पलों को खास बना देते हैं। छतों पर जमा होकर पतंग काटने की प्रतिस्पर्धा और “वो काटा!” की गूंज से वातावरण उत्साह से भर उठता है।

अब आप समझ गए होंगे कि मकर संक्रांति मनाने का एक बड़ा कारण यह सामूहिक उल्लास और ऊर्जा का संचार है।

दुनिया भर के रिकॉर्ड्स सबसे ऊंची पतंग उड़ाने का रिकॉर्ड:

  • 23 सितंबर, 2014: ऑस्ट्रेलिया के रॉबर्ट मूरे ने एक पतंग को 4879 मीटर (करीब 5 किलोमीटर) तक उड़ाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
    सबसे बड़ी पतंग:
  • 2005: कुवैत में आयोजित पतंग उत्सव के दौरान अब्दुल रहमान और फारिस ने दुनिया की सबसे बड़ी पतंग उड़ाई, जो 25 मीटर लंबी और 40 मीटर चौड़ी थी।
    सबसे लंबी काइटसर्फिंग यात्रा:
  • पुर्तगाल के फ्रांसिस्को लुफिन्हा ने 862 किमी की सबसे लंबी काइटसर्फिंग यात्रा का रिकॉर्ड बनाया।
    एक डोर से सबसे अधिक पतंगें उड़ाने का रिकॉर्ड:
  • 2006: चीन के मा क्विंगहुआसेट ने एक ही डोर से 43 पतंगें उड़ाने का विश्व रिकॉर्ड बनाया।

भारतीय रिकॉर्ड्स सबसे छोटी पतंग:

  • पंजाब के मोहाली में रहने वाले डॉ. दविंदर पाल सहगल ने सूई की छेद से सात सबसे छोटी पतंगें आर-पार करवाईं, जिससे उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ।
    अब तक की सबसे छोटी पतंग 5 मिमी की है।
    सबसे बड़ी पतंग:
  • गुजरात में आयोजित 25वें अंतरराष्ट्रीय पतंग उत्सव में नागपुर के गुलाबचंद जांगिड ने 26 फीट x 16 फीट लंबी पतंग उड़ाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
    हवा की आदर्श गति:
  • आमतौर पर पतंग को उड़ाने के लिए हवा की गति 6 से 20 किमी प्रति घंटे के बीच सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

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