पहली महिला शिक्षिका, सावत्रीबाई फुले

सावित्रीबाई फुले भारतीय इतिहास में उन महिलाओं में प्रथम थी जिन्होंने महिलाओं के जीवन में शिक्षा के महत्व को सबसे पहले समझा। महिलाओं के बीच समानता और समाजिक न्याय के लिए शिक्षा के अधिकार को महिलाओं के मूलभूत अधिकार के रूप में पहचाना ही नहीं। इसके लिए प्रबल आंदोलन का नेतृत्व भी किया। वह इस विचार में विश्वास रखतू थीं कि ज्ञान ही शक्ति है, इसके अभाव में निचली जातियाँ तथा महिलाएँ प्रगति नहीं कर सकतीं। इस विचारधारा को साकार करने के लिए उन्होंने शिक्षा का प्रसार किया।
महिलाओं के शिक्षित करने के उद्देश्य के लिए उन्होंने अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर सावित्रीबाई फुले कन्या विद्यालय की स्थापना तो किया ही, स्वयं प्रथम महिला शिक्षिका बनकर अपनी भूमिका का निर्वाह किया। उन्हें महिला शिक्षा के अग्रदूत के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उनके जीवन और योगदान पर अपेक्षाकृत कम लिखा गया है।
अपमानित होकर भी महिलाओं को शिक्षित किया, सावत्रीबाई फुले ने
महिलाओं को शिक्षित करने के उद्देश्य के लिए सावित्रीबाई फुले को समाज के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उन्हें न केवल अपशब्द सुनने पड़े, बल्कि कई बार उन्हें अभद्र टिप्पणियों और हिंसा का भी शिकार होना पड़ा। लोगों ने उन पर पत्थरों और कीचड़ से हमला किया। इस सबके बावजूद, सावित्रीबाई ने अपने महान कार्य को कभी नहीं रोका।
सावित्रीबाई अपने संघर्षों के दौरान इस बात के लिए भी जानी जाती थीं कि उन्होंने दो साड़ियाँ अपने पास रखीं—एक स्कूल के लिए और दूसरी रास्ते में गंदी हो जाने की स्थिति में बदलने के लिए। उनके समर्पण और हौसले का यह छोटा सा विवरण भी उनके महान व्यक्तित्व की झलक देता है।
बलवंत सखाराम कोहले ने सावित्रीबाई की स्मृति में उनके द्वारा किए गए महान कार्यों को बताया। वह अक्सर पीड़ितों के पास पहुंचतीं और उनकी मदद करतीं। सावित्रीबाई ने अपने विरोधियों को जवाब देते हुए कहा:
” मैं अपनी बहनों को शिक्षित करने का पवित्र कार्य कर रही हूं, तुम मुझ पर पत्थर और गोबर फेंको। ये सब मुझे फूल जैसे लगते हैं। भगवान तुम पर कृपा करे।”
सामाजिक कुरोतियों के खिलाफ भी संघर्ष किया, सावत्रीबाई फुले ने
ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने 19वीं शताब्दी में लड़कियों की शिक्षा, सामाजिक सुधार, और सत्यशोधक समाज की स्थापना जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के साथ विधवाओं और अकाल पीड़ित पुरुषों के लिए भी उल्लेखनीय सेवा की। उस समय हिंदू समाज में कम उम्र में शादी करना परंपरा थी, जिससे अनेक महिलाएँ छोटी उम्र में ही विधवा हो जाती थीं। धार्मिक मान्यताओं के कारण 1881 तक विधवाओं का पुनर्विवाह वर्जित था।
कोल्हापुर के राजपत्र में यह दर्ज किया गया कि विधवाओं को सिर मुंडवाने और अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीने के लिए बाध्य किया जाता था। ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने इन परंपराओं को बदलने के लिए आंदोलन छेड़ा। उन्होंने नाइयों से आग्रह किया कि वे विधवाओं के बाल काटने से इनकार करें। यह आंदोलन न केवल सामाजिक बंधनों को तोड़ने की पहल थी, बल्कि विधवाओं के आत्मसम्मान की रक्षा का प्रयास भी था।
उस समय महिलाओं के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं थी, जिसके कारण वे शोषण और उत्पीड़न का शिकार बनती थीं। कई बार, महिलाओं का उनके ही रिश्तेदारों द्वारा यौन उत्पीड़न किया जाता था। ऐसी परिस्थितियों में गर्भवती महिलाओं को मजबूरी में गर्भपात कराना पड़ता, और कई महिलाओं को बेटी पैदा होने के डर से अपने बच्चे की हत्या करने पर विवश होना पड़ता था।
एक बार, ज्योतिबा फुले ने काशीबाई नाम की एक विधवा से मुलाकात की, जो आत्महत्या करने वाली थी। उन्होंने उसे आश्वासन दिया कि वे उसके होने वाले बच्चे को अपना नाम देंगे। सावित्रीबाई ने न केवल उस महिला को अपने घर में रहने की अनुमति दी, बल्कि उसकी हर संभव सेवा भी की। जब बच्चे का जन्म हुआ, तो ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने उसे गोद ले लिया और उसका नाम यशवंत रखा। यशवंत को उन्होंने डॉक्टर बनाया।
महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए, सावित्रीबाई और ज्योतिबा ने 1863 में ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ नामक केंद्र की स्थापना की। यह केंद्र उन महिलाओं के लिए आश्रय और सुरक्षा प्रदान करता था, जो अत्याचारों और सामाजिक उपेक्षा से पीड़ित थीं। ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले के इन प्रयासों ने भारतीय समाज में महिलाओं के अधिकारों और समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक क्रांति की नींव रखी।
समाज सुधार और समानता के विचार पर आधारित था सत्यशोधक समाज
सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने 24 सितंबर 1873 को सत्यशोधक समाज की स्थापना की। यह संस्था समाज सुधार और समानता के विचार पर आधारित थी, और इसका मुख्य उद्देश्य नाममात्र के खर्च पर, बिना पुरोहित और दहेज के, लड़कियों की शादी कराना था। इस केंद्र की सबसे समर्पित सदस्य सावित्रीबाई फुले थीं।
सत्यशोधक समाज के तहत पहला विवाह सावित्रीबाई की मित्र बाजूबाई निंबरकर की बेटी राधा और कार्यकर्ता सीताराम जाबाजी अल्हट के बीच हुआ। इस ऐतिहासिक विवाह का सारा खर्च सावित्रीबाई ने स्वयं वहन किया। इस प्रकार के विवाह पंजीकृत विवाह के समान थे।
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देश के अधिकांश पुरोहित सत्यशोधक विवाहों के विरोध में थे और उन्होंने इसे अदालत में चुनौती देने की धमकी दी। इसके बावजूद, सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले अपने विचारों पर अडिग रहे। 4 फरवरी 1889 को उन्होंने अपने दत्तक पुत्र यशवंत का विवाह भी इसी रीति से करवाया। यह विवाह आधुनिक भारत का पहला अंतरजातीय विवाह माना जाता है।
इस सत्यशोधक विवाह में दूल्हा अपनी पत्नी से यह वादा करता था कि वह जीवन के हर क्षेत्र में, विशेषकर शिक्षा में, उसका समर्थन करेगा। राधा गनोवा कृष्णाजी साशाने की बेटी थीं, और शादी से पहले सावित्रीबाई ने राधा को अपने घर बुलाकर उनके शिक्षा के प्रति समर्पण और घरेलू कार्यों में दक्षता को बढ़ावा दिया।

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।