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स्वतंत्र ही वयस्क है और प्रेम का पात्र भी

“प्रेम और वयस्कता का गहरा संबंध होता है। मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक परिपक्वता ही व्यक्ति को सच्चे प्रेम के योग्य बनाती है। जानिए कैसे स्वतंत्रता और वयस्कता प्रेम का आधार बनती है।”

प्रेम एक सहज वृत्ति है। कोई भी, किसी भी उम्र में, किसी से प्रेम कर सकता है। परंतु प्रेम के कई रूप होते हैं। जन्म लेते ही माँ का स्नेह बच्चे का पोषण करती है। परिजनों का प्रेम बच्चों को जीवन की तैयारियों में सहयोग प्रदान करता है।

जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वे प्रेम के विभिन्न रूपों का अनुभव करने लगते हैं। मित्रता भी प्रेम का ही एक रूप है, जो व्यक्ति के मानसिक निर्माण में अहम भूमिका निभाती है।

प्रेम के लिए वयस्क कौन है?

प्रेम के सभी रूप मनुष्य को भावनात्मक, भौतिक और सामाजिक स्तर पर सुरक्षित बनाए रखने का उपक्रम हैं। जन्म के बाद से ही मनुष्य के मन के धरातल पर दो शक्तियाँ संघर्षरत रहती हैं—एक ओर ज्ञान का प्रकाश है, जो संवेदना को जागृत करते हुए व्यक्ति को प्रेम के लिए तैयार करता है, तो दूसरी ओर अज्ञान का अंधकार है, जो व्यक्ति को क्रोधी बनाता है और उसके मन पर अहंकार का कोहरा छा जाता है।

प्रेम और अहंकार के इस संघर्ष में जब किसी व्यक्ति के मानस में प्रेम का महत्त्व स्थापित हो जाता है, तब उसे वयस्क कहा जाता है।

वयस्कता और प्रेम का संबंध बचपन व्यक्ति के मानसिक निर्माण का काल होता है। इस अवस्था में विभिन्न प्रवृत्तियाँ—प्रेम, अहंकार, यथार्थ और कल्पनाएँ—साथ-साथ प्रवाहित होती हैं। परिवार का सुरक्षित ढाँचा व्यक्ति को हर स्थिति में संबल प्रदान करता है और उसे बिखरने नहीं देता।परंतु जब व्यक्ति बड़ा होता है, तो केवल सकारात्मक शक्तियाँ ही उसे संपूर्ण बनाती हैं।

परिवार और समाज का सकारात्मक वातावरण बच्चे को वयस्क बनने में सहायता करता है। इसके विपरीत, नकारात्मक माहौल व्यक्ति को शारीरिक रूप से तो वयस्क बना देता है, लेकिन मानसिक रूप से वह जीवन भर अल्पवयस्क बना रहता है।अल्पवयस्क लोग प्रेम के लिए तरसते रहते हैं। यदि उनके जीवन में प्रेम आता भी है, तो वह स्थायी नहीं रहता।

प्रेम: एक सतत अभ्यास

प्रेम एक अभ्यास के समान है। बचपन में यह अभ्यास परिजनों के साथ होता है, किशोरावस्था में मित्रों के साथ, और वयस्क होने पर उस व्यक्ति के साथ, जिसके साथ हम अपना जीवन साझा करना चाहते हैं।

प्रेम के प्रत्येक चरण में व्यक्ति कुछ न कुछ सीखता है और अपनी वयस्कता अर्जित करता है। इस प्रक्रिया में उसके आसपास के लोग उसकी सहायता करते हैं। धीरे-धीरे वह एक ऐसी अवस्था में पहुँचता है, जब वह पूरी तरह से वयस्क हो जाता है और अपनी स्वतंत्रता को अभिव्यक्त करने में सक्षम होता है।

स्वतंत्रता ही वयस्कता की पहचान है, और केवल स्वतंत्र व्यक्ति ही प्रेम का पात्र होता है।

स्त्री-पुरुष प्रेम और वयस्कता

सही अर्थों में स्त्री-पुरुष प्रेम को आत्मसात करने की क्षमता केवल उसी व्यक्ति में विकसित हो सकती है, जो पूर्णतः वयस्क हो। वयस्कता बिना मानसिक विकास और संवेदनशीलता के संभव नहीं है, क्योंकि इनके अभाव में स्त्री-पुरुष संबंध प्रेम न रहकर वासना बन जाता है।

वासना क्षणिक होती है, और इसके समाप्त होते ही स्त्री-पुरुष का रिश्ता कलह में बदल जाता है, जिससे व्यक्ति की मानसिक शांति नष्ट हो जाती है।

जो व्यक्ति आर्थिक, वैचारिक और सामाजिक रूप से पराश्रित है, वह प्रेम के लिए परिपक्व नहीं हुआ है। किशोरावस्था में जैविक प्रेम के प्रति जो तीव्र भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, समाज उन्हें इसलिए प्रोत्साहित नहीं करता क्योंकि इस अवस्था में व्यक्ति शारीरिक रूप से वयस्क होता है, लेकिन मानसिक रूप से प्रायः अपरिपक्व ही रहता है।


एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि स्त्री-पुरुष प्रेम भी प्रेम की अंतिम परिणति नहीं है। यह भी अभ्यास का एक चरण मात्र है। प्रेम और वयस्कता की एक उच्चतर अवस्था भी होती है, जहाँ प्रेम का उदात्तीकरण होता है।

यह प्रक्रिया कई चरणों में विस्तृत होती है। इन चरणों में सामाजिक उत्थान और मानव-मुक्ति के मार्ग खुलते हैं। यही प्रेम जीवन के परम ध्येय को परिभाषित करता है और व्यक्ति को उसकी साधना के लिए प्रेरित करता है।

देवाशीष प्रसून

देवाशीष प्रसून महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में कंसल्टेंट के तौर पर अपनी भूमिका निभाई। 'अहा! ज़िंदगी' में असिसटेंट एडिटर रहे हैं। फिलहाल दरंभगा में रहते हैं और स्वतंत्र व्यवसाय कर रहे हैं

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