होली ! हमारा मन कभी रंग बसंत हुआ ही नहीं….

रंग ! होली के इस लफ्ज़ मात्र से ही मन डुबकियां लगाने लग जाता है फाग के रंग-बिरंगी दुनिया में। प्रकृति भी एक रंगरेज़ के तरह रंगों की रंगोली रचने लगता है। होली को बसंत के बाद का रंगबसंत का मौसम कहना कहीं से गलत नहीं होगा। जिसमें रंग का एक अर्थ रौनक और दूजा आनंद और तीजा उत्सव। कहते है होली के एक दिन इस जीवन का दर्पण है।
अधिकांश लोगों के लिए होली का मतलब है रंग, मस्ती, गुझियां,पुआ, दही-पापड़ी या दही बड़े या फिर भांग। पर महिलाओं और लड़कियों के लिए होली बदतमीज़ी, छेड़छाड़, हिंसा का डर और घर में ढ़ेर सारे काम। पकवान, परिधान और मेल-मिलाप का यह उत्सव कमोबेश हर महिलाओं के लिए घरों में कुछ दिनों के लिए बढ़ गए दोगुने काम और चौगुनी भावनाओं का होता है। उसपर त्यौहार सबों का है तो छुट्टी तो काम वाली आया का भी होता है और काम इतने कि आठ हाथ कर लो फिर भी खत्म नहीं होते है। होली में ही नहीं दूसरे पर्व-त्यौहारों में भी यह शिकायत हर दूसरी महिलाओं को होता है, जो काफी हद तक सही भी है। बस रंग आए हैं, रंग लो का भाव रहा है होली है तो थोड़ा अबीर-गुलाल लगा लो। मन के भावों में होली का उमंग, मन का मोर कभी नाचता ही नहीं है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि होली में महिलाओं का मन कभी रंग-बसंत हुआ ही नहीं……अगर हुआ तो बस समाज के रघुबीरों का……

रंग तो है जीवन,बस वो रंग बसंत नहीं है…..
हर महिलाओं के जीवन में रंगों के बिना बेरंग सा होता है। मेहदी, आलता, माथे की बिंदिया, सिंदूर, नेल-पालिस से लिपिस्टिक तक, बेशक महिलाओं के जीवन में एक नहीं अनेक रंग है। होली के रंगों का रंग-बसंत उनके जीवन में उस तरह तो कतई नहीं आता है। मन से महसूस करने का मौका मिले, तब होली के रंग-बसंत वाले रौनक को महसूस करे। घर में लोगों के खान-पीन के फारमाइश को पूरा करने से थोड़ी मुक्ति मिले। घर के परदे से लेकर चादर, हर सदस्यों के लिए कपड़ों की मार्केटिग, बाज़ार में बजते हुए अश्लील-फूहड़ गाने, जिसको सुनकर चीर कर देखने वाली आंखे, होली के दिन मालपुआ की चाश्नी के तार, दही-बड़े के साफ्टनेस, ठढ़ई के डाई-फ्रूट, मटन को लजीज बनाने से लेकर, हर व्यजनों के प्लेट धोने-लगाने से फुर्सत मिले। किसी को मां के हाथ के दही-बड़े, पुआ पसंद है तो किसी को चाची या भाभी के हाथ के मटन….महिलाओं को छोड़कर कोई रसोई के कामकाज में मदद करने नहीं आता।कमर में दर्द लिए कमोबेश हर घर में महिलाएं रसोई के चार कोने और बाज़ार में चक्करघिन्नी के तरह नाचती रहती है।घर के सारे काम निपटाते, लोगों के फरमाइश पूरा करते और घर की सफाई करते हुए हर महिला का दिन होली के दिन भी कुछ नया नहीं होता है।यह सही है कि कई जिम्मेदार पुरुष अपनी पर्व-त्योहार में अपनी भूमिकाओं को बदला है और वह भी घर के कामों में महिलाओं का हाथ बंटाने भी लगे है, मगर एक बड़ी आबादी उन महिलाओं का है जो आज भी पुरुषों के संवेदनशील होने के इतंजार में बैठी हुई है…
महिलाओं के हिस्से में थोड़ा सा रंग-बसंत। वह भी जबरदस्ती छू लेने, रंग लगाने या मन को आहत कर देने वाली शंकाओं के साथ। गैर तो गैर, अपने भी यह पीड़ा देने में पीछे नहीं रहते। फिर कैसी होली और क्या ही होली का रंग-बसंत….बस एक मौसम के तरह आता है और चला जाता है।
होली के रंग बसंत के मौज, उमंग और उत्सव को महसूस करने के लिए महिलाएं परिवार और समाज से जिस संवेदनशीलता की उम्मीद करती है, वह कभी आता ही नहीं है। फिर कैसे होती है और किसकी होली…बस आती है होली और चली जाती है होली…।
होली खेलना ही छोड़ दिया ……

वाटस अप पर जब महिला साथियों से पूछा- इस बार होली ऎसा क्या है, जिसको आप बदलना चाहती है, जिससे रंगों का त्यौहार आपके लिए खुशनुमा हो सके। अधिकांश ने कहा – घर के काम कुछ कम हो जाए या घर के लोग काम में हाथ बटाएं।
कुछ महिला साथियों ने कहा – होली खेलना ही छोड़ दिया। मन और तन के जंजाल से मुक्त रहना चाहती है। कई होली में पुरुष मित्रों के साथ में होने के बाद भी छेड़छाड़ से बच नहीं पाई,फिर गाली-गलौच और बुरा न मानो होली है बोलकर जैसे गंगा नहा लेते है सब।
स्कूल-कालेज जाने वाली महिला साथियों ने बताया – वह होली के आस-पास स्कूल या कालेज ही नहीं जाती। गीले कपड़ों के साथ घर आना और रास्ते में लोगों के भद्दे कमेट्स के परेशानियों ने काफी झकझोर देती है।
इन जवाबों ने यह सोचने को मजबूर किया कि घर के कामों में हाथ नहीं बटाने वाले पुरुष खासकर पर्व-त्यौहारों में, होली खॆलने के बहाने छेड़छाड़ और अश्लील-भद्दे कमेट्स करने वाले पुरूष और स्कूल-कालेज जा रही लड़कियों या बाज़ार-हाट करने वाली महिलाओं पर पानी डालने लड़के या बच्चे किसी न किसी घर-परिवार से ही आते है। क्या उनके माता-पिता या परिवार के सदस्यों ने समाजीकरण में अश्लीलता, फूहड़ता या टुच्चापन ही सिखाया है? जो वो किसी के शर्मिदर्गी का कारण बनने में गर्व महसूस करते है ? या फिर ये कुछ मुठ्ठीभर लोग है जो अपनी उड्डडता का मैडल कंधे पर टांगकर गर्व महसूस करते है।
हमारी समाजीकरण में लैंगिक असमानता का पाठ कूट-कूट कर इनमें भरा गया है, इसलिए अमर्यादित हरकत में इसको खुशी और गर्व महसूस होता है।
अश्लील-फूहड़ रिवायतों का बदलना जरूरी है
बिहार सरकार ने होली में अश्लील,फूहड़ और जातिसूचक गीतों के खिलाफ आदेश जारी किया है। जिसमें इस बात को संज्ञान में लिया गया है कि होली के गीतों में अश्लीलता पर अंकुश लगाया जाए। यह आदेश सभी पुलिस मुख्यालय में भी भेजा गया है। यही नहीं बिहार में कई जगहों पर होली में होने वाली अश्लीलता को रोकने के लिए प्रतिवार्द मार्च भी बीते दिनों निकाला गया।
जो यह सिद्ध करता है कि होली पर्व को लोकतांत्रिक और संवेदनशील बनाने का प्रयास केवल सरकार के भरोसे नहीं, सामाजिक संवेदनशीलता से करने की आवश्यकता है। इस होली समाज को होली के प्रति संवेदनशील बनाने और फिर रंग बसंत के उत्सव में डूब कर कहे…होली है……

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।