कमलादेवी चट्टोपाध्याय: एक असाधारण व्यक्तित्व

अपने विद्यार्थी जीवन में भारत की बेताज मलिका के रूप में विख्यात कमलादेवी चट्टोपाध्याय सौंदर्य, बुद्धिमत्ता, प्रतिबद्धता और साहस से परिपूर्ण एक दुर्लभ व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। उनके व्यक्तित्व में उनकी माता, दादी तथा ब्रिटिश सफ्रागेट मार्गरेट कजिन द्वारा दिए गए जीवन-मूल्यों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता था।
वह भारतीय महिलाओं की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती थीं, जो केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि महिलाओं को संकीर्ण सामाजिक और आर्थिक बंधनों से मुक्त कराने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं।
अपने दीर्घ सार्वजनिक जीवन में, राजनीतिक नेतृत्व के गुणों से परिपूर्ण होने के बावजूद, कमलादेवी सत्ता और पदलोलुपता से सदैव दूर रहीं। उनके लिए जनता की सेवा और उनके कष्टों का निवारण ही सर्वोपरि था।
रूढ़ियों को तोड़ने वाली माँ और बेटी
कमलादेवी का जन्म मैंगलोर में एक गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता अनंतथैया धारेश्वर ज़िला कलेक्टर और प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति थे, लेकिन जब कमलादेवी छोटी थीं, तभी उनका निधन हो गया। इसके बाद, उनकी मां गिरिजाबाई ने उनकी परवरिश की।
19वीं सदी में लड़कियों की शिक्षा की उचित व्यवस्था नहीं थी, लेकिन गिरिजाबाई ने घर पर ही पंडितों के माध्यम से शिक्षा प्राप्त की थी। समाज के दबाव के कारण, उन्होंने मात्र 11 वर्ष की आयु में कमलादेवी का विवाह कर दिया। लेकिन विवाह के एक-डेढ़ वर्ष बाद ही उनके पति का निधन हो गया।
गिरिजाबाई ने अपनी बेटी को विधवा जीवन के पारंपरिक रीति-रिवाजों में जकड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने न तो कमलादेवी का सिर मुंडवाया, न सफ़ेद साड़ी पहनने को बाध्य किया और न ही उन्हें अकेली कोठरी में पूजा-पाठ करने के लिए मजबूर किया। समाज की परवाह न करते हुए, उन्होंने अपनी बेटी को शिक्षा के लिए स्कूल भेजा और उसे आगे बढ़ने का अवसर दिया।
जब फिल्मों में महिलाओं का काम करना अनुचित माना जाता था, तब कमलादेवी ने कन्नड़ भाषा की पहली मूक फ़िल्म ‘मृच्छकटिका’ में अभिनय किया। इसके बाद, उन्होंने 1943 में हिंदी फिल्मों ‘तानसेन’, ‘शंकर पार्वती’ और 1945 में ‘धन्ना भगत‘ में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं।
गांधीजी से मतभेद और नमक सत्याग्रह
कमलादेवी महात्मा गांधी से अत्यधिक प्रभावित थीं, लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका को लेकर उनके विचारों को चुनौती देने में भी संकोच नहीं किया।
जब उन्हें पता चला कि गांधीजी ‘नमक सत्याग्रह’ में महिलाओं को शामिल नहीं करना चाहते, तो वे स्तब्ध रह गईं। महात्मा गांधी का मानना था कि महिलाओं की भूमिका केवल चरखा चलाने और शराब की दुकानों की घेराबंदी करने तक सीमित होनी चाहिए।
कमलादेवी ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई और गांधीजी से सीधे बात की। उन्होंने तर्क दिया कि महिलाएं स्वतंत्रता संग्राम के हर पहलू में योगदान दे सकती हैं और उन्हें करना भी चाहिए। गांधीजी ने पहले तो उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन उनके ठोस तर्कों को सुनने के बाद, उन्होंने ‘नमक सत्याग्रह’ में महिलाओं की भागीदारी की अनुमति दे दी। यह निर्णय ऐतिहासिक साबित हुआ।
इसके बाद, बंबई में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व करने के लिए गांधीजी ने सात सदस्यीय टीम बनाई, जिसमें कमलादेवी और अवंतिकाबाई गोखले भी शामिल थीं।
कमलादेवी ने जवाहरलाल नेहरू के साथ गहन बौद्धिक बहसें कीं। 1934 में, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर एक समाजवादी समूह के गठन में सहयोग किया और जयप्रकाश नारायण व राम मनोहर लोहिया के साथ स्वतंत्रता संग्राम के वामपंथी विचारधारा के प्रभावशाली नेताओं में से एक बनीं।

हस्तशिल्प, सहकारिता आंदोलन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण
महात्मा गांधी के प्रभाव में आकर, कमलादेवी ने भारतीय सहकारिता आंदोलन को एक नई ऊँचाई दी। उन्होंने स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों को सम्मान दिलाने के लिए कई अभियानों का नेतृत्व किया।
उनके अथक प्रयासों के कारण ही अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड और अखिल भारतीय हथकरघा बोर्ड जैसी संस्थाएँ अस्तित्व में आईं।
आज हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग को जो प्रतिष्ठा मिली है, उसका श्रेय काफी हद तक कमलादेवी को जाता है। उन्होंने अपनी नीतियों के माध्यम से कला, संगीत, नृत्य और रंगमंच को संरक्षित और प्रोत्साहित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शरणार्थियों का पुनर्वास और फरीदाबाद का निर्माण
आज का फरीदाबाद शहर कमलादेवी चट्टोपाध्याय के प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने इंडियन को-ऑपरेटिव यूनियन की मदद से, भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर प्रोविंस से आए शरणार्थियों के पुनर्वास की योजना बनाई।
जब उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने यह प्रस्ताव रखा, तो उन्होंने इसे केवल इस शर्त पर स्वीकार किया कि सरकार से आर्थिक सहायता की कोई उम्मीद नहीं रखी जाएगी।
आज का फरीदाबाद शहर कमलादेवी चट्टोपाध्याय के प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने इंडियन को-ऑपरेटिव यूनियन की मदद से, भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर प्रोविंस से आए शरणार्थियों के पुनर्वास की योजना बनाई।कमलादेवी ने जनसहभागिता के आधार पर फरीदाबाद को एक विकसित शहर में बदलने की नींव रखी।

एक प्रेरणादायक विरासत
कमलादेवी का जीवन केवल स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं था; वे महिला सशक्तिकरण, सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रतीक भी थीं।
उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘इनर रिसेस, आउटर स्पेसेस’ में अपने संघर्षों और विचारों को साझा किया। हालांकि, उनके व्यक्तिगत जीवन के कई पहलू सार्वजनिक रूप से अधिक उजागर नहीं हुए।
उनके संघर्षों ने न केवल भारत की राजनीति और समाज को प्रभावित किया, बल्कि कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी नई चेतना का संचार किया।
निस्संदेह, कमलादेवी चट्टोपाध्याय की कहानी आधुनिक भारत की कहानी है – एक प्रेरणादायक, ऐतिहासिक और अद्वितीय यात्रा।
संदर्भ
निको स्लेट,कमलादेवी चट्टोपाध्याय: स्वतंत्रता की कला