एंडोमेट्रियोसिस: एक अनदेखी बीमारी जिससे जूझ रही हैं करोड़ों महिलाएँ

महिलाओं में एक गंभीर बीमारी है जिससे पेट दर्द, भारी रक्तस्राव और इनफर्टिलिटी जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। जानें लक्षण, कारण और इलाज।
दस में आठ भारतीय महिलाओं को यह पता भी नहीं होता कि उसके शरीर में एक बीमारी पल रही है। जिसके वज़ह से पीरियड्स के दौरान हैवी ब्लीडिंग, पेट में असहनीय दर्द, क्रैम्प्स, पेल्विक पेन होता है। जिसका तुरंत निदान पेन किलर दवाईयां या गर्म पानी से सिकाई जैसे तरीकों से महिलाएं कर लेती है।
कुछ जागरूक महिलाएं जो अपने स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर सजग होती है डॉक्टर के पास जाती है तो जांच के बाद उन्हें पता चलता है कि वह एक समस्या से गुज़र रही है जिसको डाक्टरी भाषा में एंडोमेट्रियोसिस कहा जाता है।
बॉलीवुड एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी की बहन शमिता शेट्टी ने एंडोमेट्रियोसिस सर्जरी पहले अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक वीडियो शेयर कर इसकी जानकारी दी। उन्होंने महिलाओं को यूटेरस की इस बीमारी से सावधान और जागरुक रहने की सलाह दी। उनके इस विडियों के बाद भारत में एंडोमेट्रियोसिस पर थोड़ी बहुत बातचीत हुई पर वो बातचीत में ऊंठ के मुंह में जीरे के समान ही साबित हुई।

‘दंगल’ में बबीता फोगाट का किरदार निभाने वाली मशहूर एक्ट्रेस सान्या मल्होत्रा ने हाल ही में अपनी एंडोमेट्रियोसिस की बीमारी के बारे में खुलकर बात की है। उन्होंने बताया कि साल 2024 में उन्हें इस बीमारी का पता चला। इस बीमारी की वजह से वह अपनी फिटनेट को लेकर ज्यादा सजग हुई है। सान्या ने बताया कि इस बीमारी के कारण उनके शरीर में कई सारे हार्मोनल उतार-चढ़ाव हुए हैं।
एंडोमेट्रियोसिस की बीमारी को लेकर WHO ने क्या कहा?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) एंडोमेट्रियोसिस को एक स्त्री रोग संबंधी स्थिति के रूप में समझाता है, जिसमें गर्भाशय गुहा के बाहर गर्भाशय की परत (एंडोमेट्रियल ऊतक) के समान ऊतक की वृद्धि होती है. इससे सूजन, दर्द और बांझपन सहित कई दिक्कतें हो सकती हैं. यह अनुमान लगाया गया है कि प्रजनन आयु की लगभग 6-10% महिलाएं इस स्थिति से पीड़ित हैं, जिसके लक्षण अक्सर किशोरावस्था में शुरू होते हैं.
एंडोमेट्रियोसिस क्या है और यह क्यों होता है
एंडोमेट्रियोसिस महिलाओं के यूटेरस (गर्भाशय) से जुड़ी बीमारी है। यूटेरस की लाइनिंग को एंडोमेट्रियम कहा जाता है। एंडोमेट्रियम पीरियड्स के दौरान हर महीने ब्लीडिंग के रूप में शरीर से बाहर निकलता है। लेकिन अगर किसी को एंडोमेट्रियोसिस हो जाए तो यह एंडोमेट्रियम उन जगहों पर बढ़ जाता है, जहां इसे नहीं बढ़ना चाहिए। जैसे अंडाशय (ओवरी), आंत और पेल्विक कैविटी टिशूज में। इसमें ब्लड बाहर निकलने की बजाय अंदर ट्यूब में ही जम जाता है, जिससे गर्भावस्था में मुश्किल पैदा हो सकती है।

कई हेल्थ स्टडीज से पता चला है कि पूरी दुनिया में हर 10 में से 1 महिला को एंडोमेट्रियोसिस है। यह बीमारी महिलाओं में बांझपन (इनफर्टिलिटी) का भी प्रमुख कारण है। इस परेशानी से जूझ रही महिला को कंसीव करने में मुश्किलें आ सकती हैं।
एंडोमेट्रियोसिस सोसाइटी ऑफ इंडिया के अनुसार, लगभग 2.5 करोड़ भारतीय महिलाओं को एंडोमेट्रियोसिस है। यह सबसे ज्यादा 30 से 45 साल की महिलाओं में होता है l
दुनियाभर में बढ़ रही है ये बीमारी
वैश्विक स्तर पर प्रजनन आयु वाली लगभग 190 मिलियन (19 करोड़) लड़कियों और महिलाओं को एंडोमेट्रियोसिस की समस्या हो सकती है। वहीं भारत में 15 से 49 वर्ष की प्रजनन आयु वाली 10 फीसदी महिलाओं में इस समस्या का पता चला है।
जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ में भारत के शोधकर्ताओं ने रिपोर्ट में बताया कि भारत सहित दुनिया के कई देशों में एंडोमेट्रियोसिस पर बहुत कम या बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। चिंताजनक बात ये है कि अधिकतर महिलाएं भी इस स्वास्थ्य समस्या से अनजान हैं। जागरूकता की कमी के कारण रोग का समय रहते इलाज और उपचार भी नहीं हो पाता है।
एंडोमेट्रियोसिस और इसके कारण होने वाली समस्याएं
एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिलाओं में कई प्रकार के जटिल लक्षणों के साथ अक्सर दर्द (पेल्विक, पीठ-पेट) की दिक्कत बनी रहती है। मासिक चक्र के दौरान शरीर में हार्मोनल परिवर्तन के कारण एंडोमेट्रियल (गर्भाशय की परत) जैसे ऊतक में कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं और फिर इनका ब्रेक डाउन होता है, जो रक्तस्राव की समस्या का कारण बन सकती हैं।
पीरियड्स के दौरान, मासिक धर्म का रक्त तो शरीर से बाहर निकल जाता है पर कोशिकाओं के ब्रेक डाउन से होने वाला रक्तस्राव शरीर के अंदर ही रह जाता है जिससे इंफ्लामेशन और इसके कारण होने वाली कई बीमारियों का खतरा हो सकता है। अगर समय रहते इस समस्या का सही निदान और उपचार न किया जाए तो इसके कारण प्रजनन विकारों की समस्या भी हो सकती है।
एंडोमेट्रियोसिस से बचाव कैसे मुमकिन है दुनिया की बाकी लाइफ स्टाइल डिजीज की तरह एंडोमेट्रियोसिस का भी सीधा संबंध इस बात से है कि हम कितना हेल्दी खाते हैं, कितना व्यायाम करते हैं, कैसे सोचते और महसूस करते हैं। यानी कुल मिलाकर हम अपनी जिंदगी में कितने खुश और तनावमुक्त हैं।
इसलिए इस बीमारी से बचने का सबसे सरल और बुनियादी उपाय है अपनी लाइफ स्टाइल में बदलाव। भारत में एंडोमेट्रियोसिस का निदान न होना एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसे जागरूकता, शिक्षा और वकालत के माध्यम से संबोधित करने की आवश्यकता है

बेगूसराय, बिहार की रहने वाली अंशू कुमार ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमफिल और पीएचडी पूरी की है। उनकी कविताएँ सदानीरा, हिंदवी, हिन्दीनामा और अन्य पर प्रकाशित हुई है समकालीन विषयों पर उनके लेख नियमित रूप से अखबारों और डिजिटल प्लेटफार्म में पब्लिश होते रहते हैं। वर्तमान में वह अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में रिसर्च फेलो के रूप में कार्यरत हैं।