मिसेज हर महिला की कहानी है चाहे हाउस वाइफ हो या वर्किंग वूमेन

सान्या मल्होत्रा की फिल्म ‘मिसेज’ मलयालम कल्ट क्लासिक ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ की रीमेक है। मिसेज हर महिला की कहानी है चाहे हाउस वाइफ हो या वर्किंग वूमेन। दोनों ही कहानी कहती है कि अपने अस्तित्व को पहचानो, उसके सम्मान को पहचानो। चाहे फिल्म ‘मिसेज’ मलयालम कल्ट क्लासिक ‘द ग्रेट इंडियन किचन‘ तुलना करने के बजाय सिर्फ इस फिल्म से जुड़ी उन 5 वजहों पर नजर डालते हैं जो इसे महिलाओं से ज्यादा पुरुषों के लिए मस्ट वॉच बनाती हैं।
कहानी क्या है फिल्म ’मिसेज’ की
जी5 की ‘मिसेज’ को सिर्फ दो लाइन में समेटा जा सकता है। एक न्यूली वेड कपल महिला ऋचा (सान्या मल्होत्रा) अपने पति दिवाकर (निशांत दहिया) के घर में ढलने की कोशिश करते-करते थक जाती है और आखिरकार उसे छोड़ने का फैसला करती है। वह एक स्कूल डांस टीचर बन जाती है और अपने सपने को पूरा करती है तो उसका पति दूसरी शादी कर लेता है। लेकिन, लीड किरदार इन दो परिस्थितियों के बीच की मिसेज की कहानी दिखाता है।
मिसेज हर महिला की कहानी है चाहे हाउस वाइफ हो या वर्किंग वूमेन। ये कहती है कि अपने अस्तित्व को पहचानो, उसके सम्मान को पहचानो।
1- पाक साफ नीयत से बनाई गई फिल्म के लिए
इस फिल्म को सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए नहीं बनाया गया है। फिल्म की कहानी शादी करके ससुराल पहुंची महिला की हर रोज की जद्दोजहद के इर्द-गिर्द घूमती है। वो जद्दोजहद ऐसी है जिस पर किसी की नजर नहीं जाती, यहां तक उसके सबसे नजदीकी इंसान मां या पति की भी नहीं।
उस दर्द में महिला किस हद तक घुटती है उसका अंदाजा शायद आप इस फिल्म को देखकर लगा पाएं।ऐसा जरूरी नहीं है कि हर महिला के साथ ये होता हो, लेकिन हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां ये हम अपने आसपास होते जरूर देखते हैं। शायद ये फिल्म देखकर आप इस बात को समझ पाएं।
2- शोषण को दिखाने का नजरिया अलग है, इसे समझने के लिए
इसके पहले बहुत सी फिल्में बनीं जिनमें ऐसा ही सोशल मैसेज देने की कोशिश की गई। उनमें राइटर्स के पास महिला के साथ हो रहे शोषण को दिखाने के लिए बेहद सरल एलीमेंट्स ही थे जैसे उसके साथ मारपीट, घरेलू हिंसा या फिर गाली गलौज।
लेकिन इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है. एक भी बार महिला के साथ शारीरिक चोट पहुंचाने की कोशिश भी नहीं होते दिखाई गई। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि फिल्म में हिंसा नहीं है
बस वो उससे अलग जिसे हम आमतौर पर हिंसा मानते हैं। फिल्म देखते देखते आप सान्या मल्होत्रा के किरदार के साथ हो रही हिंसा को खुद से जोड़कर देखने लग जाएंगे क्योंकि ये शारीरिक नहीं मानसिक और भावनात्मक हिंसा थी।
3- राइटिंग-डायरेक्शन का कमाल देखने के लिए
पूरी फिल्म में मिसेज के किरदार में सान्या मल्होत्रा के ससुर उन्हें बेटा ये कर लो, बेटाजी वो कर लो, बेटा ‘आप’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके बेहद स्नेह से बुलाते दिखते हैं। फिल्म में इस स्नेह के साथ हिंसा को इस तरह से मिश्रित कर दिया गया है कि जिसके साथ ऐसा रवैया अपनाया जा रहा है, वो भी इस बात को समझ नहीं पाती।
यहां सबसे समझने वाली बात ये है कि पूरी फिल्म में मौजूद मेल कैरेक्टर्स भी इस बात को नहीं समझ पाते कि वो परिवार के नए सदस्य का असल में शोषण कर रहे हैं। राइटर डायरेक्टर ने उसी पुरुषवादी सोच को दिखाने के लिए एक पूरी फिल्म बना डाली है। इसे डायलॉग से समझाने के बजाय छोटी-छोटी घटनाओं से समझाया गया है और ये बात समझ में भी आती है।
‘बहू हमारी बेटी जैसी है…’ इतना कहने के बाद उसे खाना बनाने के तरीकों पर सवाल उठाना, सिलबट्टे पर चटनी पिसवाना और यहां तक बिरयानी को पुलाव बोलकर पूरी तरह से खारिज कर देना। ये सब कुछ उन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं के अंश हैं।
4- एक्टिंग के लिए (खासतौर पर सान्या मल्होत्रा के लिए)
फिल्म में ससुर के किरदार में कंवलजीत सिंह और पति के किरदार में निशांत दहिया ने संयम से बंधी एक्टिंग की है, जिनकी वजह से सान्या मल्होत्रा को खुलकर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला है। सान्या बॉलीवुड की वो एक्ट्रेस हैं जिनके खाते में दंगल (2000 करोड़ के ऊपर का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन) और जवान (1000 करोड़ के ऊपर का कलेक्शन) जैसी फिल्में हैं.
उसके बावजूद वो स्टार बनने के पीछे कभी नहीं भागीं। उन्होंने स्मिता पाटिल और शबाना आजमी वाली राह पकड़ ली है।
पगलैट, पटाखा और कटहल जैसी फिल्में इस बात का सबूत भी हैं। ऐसी ही बेहतरीन कंटेंट वाली फिल्मों में से एक मिसेज भी उन्होंने चुनी और इस किरदार को उसी घुटन और परेशानी दिखाते हुए निभा गई हैं जो सच की कहानियों में होता है। इसलिए उनके लिए फिल्म देखनी जरूरी है।
5- महिलाओं के साथ बढ़ती हिंसा पर ध्यान देने के लिए
फिल्म में ऐसे आंकड़े पेश नहीं किए गए, लेकिन अगर आपने फिल्म देखी तो शायद आप एक बार ये जानने की कोशिश जरूर करेंगे कि देश में ऐसी बढ़ती घटनाओं की वजह क्या है और क्यों न चाहते हुए भी कहीं न कहीं महिलाओं के साथ समाज के तौर पर हम सभी कुछ गलत कर रहे होते हैं

परंतु, मेरे लिए में वो बात नहीं बन पाई जो मुझे द ग्रेट इंडियन किचन को देखकर महसूस किया
द ग्रेट इंडियन किचन की बात को दुहराती है मिसेज
“मर्द के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है।” इस एक सूत्र वाक्य को समझने में महिलाओं का पूरा जीवन खप जाता है और महिलाएं रसोई घर का गुलाम बनाकर रह जाती हैं। नई-नई शादी के बाद पतियों के दिल तक पहुंचने के लिए रसोई घर का जो सफर महिलाओं ने शुरू किया, वह कभी खत्म नहीं होता है और पूरी ज़िंदगी गुजर जाती है। इस विषय को मलयालम भाषा के ड्रामा फिल्म “द ग्रेट इंडियन किचन” में निर्देशक जियो बेबी ने निमिषा सजयन, सूरज वंजरामुडु के स्टार कास्ट के साथ कहने की कोशिश की है और वह कामयाब भी हो गए हैं।
इस कहानी को गैर-मलयालम भाषी भी पसंद कर रहे हैं और सबटाइटल्स के सहारे समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी एक वज़ह यह हो सकती है कि भले ही भाषाएं अलग-अलग हो पर “मर्द के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है” इस सूत्र वाक्य के कारण तमाम गैर मलयालम भाषी महिलाओं का सफर भी रसोई के साथ जो शुरू होता है वह कभी खत्म नहीं होता है।
शायद ही इस दुनिया में कोई भाषा हो जिसको बोलने वाली महिला का संबंध रसोई से न हो। महिलाओं के जीवन से जुड़ा हुआ एक शास्वत सच बना दिया गया है कि रसोई का काम महिलाओं का ही है। फिर चाहे वह कामकाजी महिला हो या हाउस वाइफ, वह रसोई के साथ अपना संबंध विच्छेद कभी कर ही नहीं सकती है। महिला का रसोई के साथ संबंध और उसको लेकर महिलाओं के अपने अस्तित्व के जुड़े सवाल को कहने की कोशिश इस कहानी में है।
क्या कहानी है द ग्रेट इंडियन किचन में
निर्देशक जियो बेबी ने कहानी शुरू की है एक दो अजनबी (निमिषा सजयन और सूरज वंजरामुडु) के शादी के समारोह से, जहां दोनों शादी करके नये जीवन की शुरूआत करते हैं। उसके बाद निमिषा सजयन बार-बार रसोई में खाना बनाते हुए नज़र आती है या पति-ससुर को खाना खिलाते या घर के काम करते हुए।
जहां उसके ससुर मोबाईल-टीवी तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को जीवन में मज़े से उपयोग करते हैं पर खाने में उसे चूल्हे पर चावल ही चाहिए और चटनी मिक्सर में पीसा हुआ नहीं होना चाहिए। वे कपड़े साफ करने लिए वॉशिंग मशीन के उपयोग के भी खिलाफ हैं।
यहां तक जब निमिषा सजयन डांस स्कूल में नौकरी करना चाहती है तो इसके लिए वे मना करते हैं। पति सूरज वंजरामुडु से होटल में खाने के दौरान टेबल मैनर्स के बारे में बोलती है तो पति नाराज़ हो जाता है। वह अपने गुस्से का इस तरह से प्रदर्शित करता है कि निमिषा को माफी मांगनी पड़ती है।
कहानी में सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश की खबर टीवी पर दिखती है और निमिषा के मासिक धर्म शुरू होने पर अशुद्धता के कारण रसोई न बनाने का दृश्य सांकेतिक रूप आता है, पर इस विषय पर कहानी खड़ी नहीं होती है।
निमिषा पूरी कहानी में मुख्य पात्र के तरह दिखती है पर उसका अस्तित्व गायब दिखता है, ठीक उसी तरह जैसे वह किसी अजनबी पति के साथ सेक्स कर रही है पर उसमें कहीं शामिल नहीं है। आगे जानने के लिए आप खुद इस दिलचस्प कहानी को देखिए।

आपको क्यों देखनी चाहिए ये फिल्म
इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि कुछ भी थोपने का प्रयास नहीं किया गया है। यही प्रतीत होता है सब कुछ कितनी सहजता से चलता है, सब कुछ स्वीकृत हो जैसे। पूरी कहानी किसी भी दृश्य में कहीं भी पुरुष के भयानक क्रोध या हिंसा को नहीं दिखाया गया है। सब कुछ साइलेंट हिंसा की तरह होता है – पुरूष मीठे ज़हर के तरह अपनी इच्छा महिला पर थोपते हैं।
पूरी कहानी में बस एक चीज खटकती है वो यह कि लगातार रसोई में काम करती हुई महिला के काम की महानता को स्थापित करने की कोशिश नहीं करती है। जबकि कहानी जानती है कि रसोईघर में उसका खाना बनाने का दृश्य, या कपड़े साफ करने का दृश्य या फिर बर्तन धोने या टेबल साफ करने का दृश्य एक महिला के महान श्रम का दृश्य है, जिसका कोई भुगतान नहीं है।
चूंकि यह हर महिला, उसकी रसोई और उसके अस्तित्व से जुड़ी हुई कहानी है इसलिए इसको देखनी चाहिए।
गैर मलयालम भाषी महिलाओं को भी इसलिए क्योंकि यह उनकी भी कहानी है। जो हर महिला से कहना चाहती है कि अपने स्वयं के अस्तित्व को पहचानो, उसके सम्मान को पहचानो। ये आपकी इच्छा है कि आपको हाउस वाइफ ही बनना है या वर्किंग वूमेन बनना है पर कोई भी महिला बनने से पहले ज़रूरी है अपने अस्तित्व को पहचानने की और उस अस्तित्व को आत्मसम्मान दिलाने की। अगर महिलाएं स्वयं को पुनर्परिभाषित नहीं करेगी तो वह अपना तो जो करेगी वह करेगी ही बल्कि अपने साथ-साथ उन महिलाओं के अस्तित्व को भी ले डूबेगी जो कई मामलों में एक-दूसरे से भिन्न है महिला होकर भी।

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।