सैलाबाला दास – एक क्रांतिकारी महिला नेता और सामाजिक सुधारक

सैलाबाला दास औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्षरत एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी थीं और अपने जीवनभर महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और सामाजिक सुधारों के लिए संघर्ष करती रहीं।
सैलाबाला दास का प्रारंभिक जीवन और परिवार
सैलाबाला दास का जन्म 25 मार्च 1875 को कोलकाता के भवानीपुर में एक बंगाली परिवार में हुआ। माता-पिता की असामयिक मृत्यु के बाद, उन्हें आधुनिक उड़ीसा के संस्थापक मधुसूदन दास ने गोद ले लिया। उनकी परवरिश मधुसूदन दास और उनकी पत्नी सौदामिनी देवी ने की।
बचपन से ही स्वतंत्र विचारों वाली, साहसी और विद्रोही स्वभाव की थीं। समाज द्वारा लड़कियों पर लगाए गए प्रतिबंधों को स्वीकार करने के बजाय, उन्होंने हमेशा सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का प्रयास किया।
शिक्षा और संघर्ष: पहली महिला छात्र जो लड़कों के कॉलेज में पढ़ीं
सैलाबाला ने अपनी मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कटक के रेवेनशॉ बॉयज कॉलेज में प्रवेश लिया। उस समय उनके पिता विदेश में थे, और यह निर्णय उन्होंने स्वयं लिया। जब मधुसूदन दास स्वदेश लौटे और देखा कि उनकी बेटी ने लड़कों के कॉलेज में प्रवेश प्राप्त करने के लिए कॉलेज प्रशासन को राजी कर लिया है, तो उन्होंने इसे डांटने के बजाय प्रोत्साहित किया।
मधुसूदन दास ने इस घटना को एक क्रांतिकारी बदलाव में बदल दिया और अन्य लड़कियों को भी इसी कॉलेज में प्रवेश दिलवाया। इस निर्णय के बाद, रेवेनशॉ कॉलेज सह-शिक्षा संस्थान बन गया।
1903 में, सैलाबाला दास ने उत्कल यंग विमेन्स एसोसिएशन का प्रबंधन किया। उस समय जब महिलाओं की उच्च शिक्षा को वर्जित माना जाता था, उन्होंने इस विषय को उठाया और रेवेनशॉ गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल के रूप में नौकरशाही से संघर्ष किया।
उन्होंने उड़ीसा में पहला महिला कॉलेज स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इस संस्थान का मुख्य भवन स्वयं उपहार में दिया। वे उत्कल यूनियन कॉन्फ्रेंस की समर्पित कार्यकर्ता भी बनीं और लड़कियों की शिक्षा में सुधार लाने का बीड़ा उठाया। 1906 में, उनके पिता ने उन्हें शिक्षक के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए कैंब्रिज भेजा। 1907 में भारत लौटने के बाद, उन्होंने अपने पिता के कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभानी शुरू की।
भारत की पहली महिला मानद मजिस्ट्रेट
सैलाबाला भारत की पहली महिला मानद मजिस्ट्रेट बनीं, जिन्होंने एक वर्ष में 600 से अधिक मामलों का निपटारा किया।
1925 में, जब उन्होंने मद्रास और बंबई की महिला मजिस्ट्रेटों के बारे में समाचार पढ़ा, तो उनके मन में सवाल आया, “हमारे प्रांत में ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का पद क्यों नहीं होना चाहिए?”।
इसके तुरंत बाद, वे सीधे डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के पास पहुँचीं, जो उस समय बिहार और उड़ीसा सरकार की कार्यकारिणी परिषद में न्यायिक सदस्य एवं वित्त मंत्री थे। उनकी मांग पर विचार किया गया और उन्हें उसी वर्ष मानद मजिस्ट्रेट नियुक्त कर दिया गया।
1934 में, मधुसूदन दास के निधन के बाद, सैलाबाला ने उनकी सभी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों को संभाल लिया। हालांकि, उन्होंने चुनावी राजनीति में भाग नहीं लिया।
तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से मुलाकात के बाद, उन्होंने राज्य विधानमंडल या संसद में प्रवेश करने पर विचार किया।
राष्ट्रपति की सलाह पर, उन्होंने ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवकृष्ण चौधरी से मुलाकात की। अंततः, उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिए मैदान में उतारा गया।
महात्मा गांधी से मुलाकात और वैचारिक टकराव

1927 में, जब महात्मा गांधी उड़ीसा आए, तो सैलाबाला उनके साथ पूरे समय रहीं। गांधीजी ने उनसे उड़ीसा की महिलाओं को चरखा सिखाने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि यह आर्थिक मुक्ति का एकमात्र तरीका नहीं है।
जब गांधीजी ने उन्हें खादी पहनने का वचन देने के लिए कहा, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।
गांधीजी ने उनसे कांग्रेस की सदस्यता लेने के लिए भी आग्रह किया, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से कहा, “जब मुझे कांग्रेस के लोगों और कांग्रेस की नीति पर विश्वास हो जाएगा, तब मुझे कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करने में प्रसन्नता होगी।”
‘सदन की दादी’ का सम्मान
1952 में, जब वे सत्तरवें दशक के अंतिम चरण में थीं, वे संसद सदस्य चुनी गईं। अपनी वरिष्ठता और अनुभव के कारण, उन्हें ‘सदन की दादी’ कहा जाने लगा।
अपने पिता के देहांत के बाद, उन्होंने अपना महल-सरीखा भवन ‘मधु स्मृति’ एक शैक्षणिक ट्रस्ट को दान कर दिया।इसके बाद, अप्रैल 1952 में, वहाँ ‘सैलाबाला वुमेंस कॉलेज’ की स्थापना की गई। इसके अतिरिक्त, ‘मधु स्मृति’ का पुस्तकालय उड़ीसा उच्च न्यायालय को दान कर दिया गया।
सैलाबाला की आत्मकथा के अंतिम शब्द
उनकी आत्मकथा के अंतिम पृष्ठ 82 वर्ष की एक वृद्ध महिला की छवि प्रस्तुत करते हैं, जो अपने जीवन के अंत की प्रतीक्षा कर रही थी। वे लिखती हैं:
“मैं एकाकी हूं, फिर भी न्यायसम्मत लक्ष्यों की पूर्ति के लिए संघर्ष और दूसरों के हितों की सिद्धि के लिए कार्य कर रही हूं। मेरे जीवन में से सब कुछ जा चुका है, केवल स्मृतियां शेष हैं, जो उदासी और खालीपन की भावना उत्पन्न करती हैं।… परंतु इन सबके बावजूद, मैं ईश्वर को उसके उन समस्त बहुविध आशीर्वादों के लिए धन्यवाद देती हूं, जो उसने मेरे जीवन को प्रदान किए, तथा उसकी कृपा के लिए, जो मेरी एकाकी और वृद्धावस्था में मुझे थामे हुए है और शक्ति प्रदान कर रही है।”
संदर्भ
सुशीला नैयर, कमला मनकेकर, भारतीय पुनर्जागरण में अग्रणी महिलाएं, अनु. नेमिशरण मित्तल, नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया