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गांधी और टैगोर के विचारों से प्रभावित थीं रेणुका रे

रेणुका रे चाहती तो आराम तलब और सुविधापूर्ण जीवन का चुनाव कर सकती थीं, फिर भी उन्होंने सेवामय जीवन का मार्ग चुना। साथ ही साथ सामान्य महिलाओं के जीवन में बड़े बदलाव लाने के लिए प्रयास किए। उनकी उपलब्धियां अनेक थीं। उन्हें पर्याप्त गंभीरता से नहीं आंका गया फिर भी उनका जीवन प्रेरणादायक और उपलब्धियों से भरा हुआ हैं।

कौनी थी रेणुका रे?

4 जनवरी 1904 को पैदा हुई, रेणुका अपने पिता सतीश चंद्र मुखर्जी और माता चारुलता मुखर्जी की पहली संतान थीं। उनकी मां एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता थीं। रेणुका का बचपन बंगाल के विभिन्न जिलों में बीता, जहां उनके पिता जिलाधीश के रूप में कार्यरत थे। उनके पिता एक आई.सी.एस. (इंडियन सिविल सर्विस) अधिकारी थे, लेकिन साम्राज्य के हितों के बजाय जनसामान्य के हितों को प्राथमिकता देने के कारण अपने वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों के भेदभाव का सामना करते थे। पिता के साथ अंग्रेज सरकार का दुहरा व्यवहार ने, रेणुका के मन में स्वतंत्रता और समानता की गहरी भावना विकसित की।

इस पृष्ठभूमि में, जब कई अन्य लोग साम्राज्य और पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित हो रहे थे, रेणुका ने इन दोनों का प्रत्यक्ष अनुभव किया और एक स्वतंत्र दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने अपने शुरुआती शिक्षा लंदन के कैंसिंगटन हाई स्कूल में प्राप्त की। उस समय उनके नाना पी.के. रे, जो एक प्रसिद्ध शिक्षाविद थे और डॉ. राधाकृष्णन एवं डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे महान व्यक्तियों के शिक्षक रहे थे, भारतीय उच्चायोग लंदन में भारतीय छात्रों के परामर्शदाता के रूप में कार्यरत थे।

रेणुका ने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से ऑनर्स डिग्री के लिए अर्थशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। यहां उन्होंने हेरॉल्ड लास्की, बेवेरिज, क्लीमेंट एटली और ऐलीन पॉवर जैसे विद्वानों से ज्ञान प्राप्त किया। उनकी विशेषता यह थी कि वे किसी से चमत्कृत नहीं होती थीं; वे समालोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए सराहना और आलोचना, दोनों करती थीं।

रेणुका रे के जीवन पर उनकी मां और नानी का गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी मां, चारुलता मुखर्जी, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की सदस्या थीं और बाद में उसकी अध्यक्ष बनीं। वे समग्र बंगाल महिला संघ की संस्थापकों में से एक थीं और महिलाओं का व्यापार रोकने के उद्देश्य से आयोजित राष्ट्र संघ के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रतिनिधि और उपाध्यक्ष बनने वाली पहली महिला थीं।

हालांकि, जब उनकी बेटियों, रेणुका और छोटी नीता ने अपने कार्य में स्थिर हुए बिना ही विवाह कर लिया, तो चारुलता को गहरी निराशा हुई। रेणुका की नानी, सरला रे, भी एक अपराजेय महिला थीं। वे गोपालकृष्ण गोखले और ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मित्र थीं और बालिकाओं की शिक्षा की निर्भीक पक्षधर थीं। उन्होंने गोखले स्मारक विद्यालय की स्थापना की, जो आज भी कार्यरत है।

रेणुका रे सहज स्वभाव से जीवन भर निर्भीक और आत्मविश्वास से भरी रहीं। उन्होंने कभी भी असमर्थता सूचक भाषा, जैसे “मैं यह नहीं कर सकती” या “मैं इसके योग्य नहीं हूं,” का उपयोग नहीं किया।


पहली महिला शिक्षिका, सावत्रीबाई फुले


 

गांधीजी और रवींद्रनाथ टैगोर मिलकर, प्रभावित हुई रेणुका रे

उनके जीवन में एक प्रमुख मोड़ 1920 में आया, जब वे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांधीजी से मिलीं और स्वयंसेविका बनीं। उस समय उनकी आयु मात्र 16 वर्ष थी। इसके बाद वे जीवन भर के लिए गांधीवादी बन गईं। उन्होंने डायोसीज़न कॉलेज में चल रही अपनी पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन में भाग लेने की इच्छा जताई, लेकिन स्वयं गांधीजी ने उन्हें ऐसा करने से रोका। गांधीजी ने समझाया कि आंदोलन को शिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है। बापू की सलाह पर रेणुका ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स से पढ़ाई की।

इसके बाद वे कांग्रेस संगठन की सदस्य बन गईं। हालांकि, समय के साथ कांग्रेस की कटु आलोचक भी बन गईं, लेकिन उन्होंने किसी अन्य राजनीतिक संगठन का हिस्सा बनने से परहेज किया। इंग्लैंड में क्रांतिकारियों से मिलने पर उनकी वीरता ने उन्हें प्रेरित किया, पर गांधीजी के प्रभाव के कारण वे उनसे जुड़ने से बचीं।

उनके जीवन पर दूसरा प्रमुख प्रभाव रवींद्रनाथ टैगोर का था। टैगोर उनके पारिवारिक मित्र थे और उनके पति सत्येंद्रनाथ रे के साथ भी निकटता रखते थे। उन्होंने समझ लिया था कि ग्रामीण विकास का एकमात्र मार्ग गांधीवादी कार्यक्रमों का अनुसरण करना है, जिसे टैगोर के शांतिनिकेतन में किए गए प्रयोगों का समर्थन प्राप्त था।

वे शांतिनिकेतन की शैक्षिक नवाचारी पद्धतियों की प्रशंसिका थीं और वर्षों तक वहां की कर्म-समिति की सदस्या के रूप में कार्यरत रहीं। उनका मानना था कि सामान्य लोगों के जीवन में गरीबी और प्रगति के अभाव का मुख्य कारण गांधीजी की दृष्टि की उपेक्षा है। बीसवीं शताब्दी के चौथे और पांचवें दशकों में उन्होंने गांधीजी के मार्गदर्शन में उनके विचारों के अनुरूप कार्य किया।


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संविधान सभा की सदस्य भी थी रेणुका रे

रेणुका रे बीसवीं शताब्दी के चौथे और पांचवें दशकों में सामाजिक राहत कार्यों में लगी रहीं। उस काल में उनके पति सत्येंद्रनाथ रे, आई.सी.एस.,संग उनकी मुलाकात 1924 में इंग्लैंड में हुई थी तथा विवाह 1925 में हुआ था, विभिन्न जिलों में जिलाधीश के रूप में कार्य कर रहे थे। उनका दांपत्य अत्यंत सफल रहा। उनके पति भी पुरुषों और महिलाओं की समानता में विश्वास करते थे तथा उन्हें (रेणुका को) उनकी दृष्टि के अनुसार कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

1943-45 के दौरान रेणुका रे को महिलाओं से संबंधित कानूनों में संभावित वैधानिक परिवर्तनों पर चर्चा के लिए अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की प्रतिनिधि के रूप में केंद्रीय विधानसभा में मनोनीत किया गया। वे एक स्वतंत्र सदस्य थीं। सदन में उनके साथ केवल एक और महिला सदस्य थीं – राधाबाई सुब्बारायन, जो कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।

सर बी. एन. राव द्वारा प्रस्तावित हिंदू महिला उत्तराधिकार विधेयक समान नागरिक संहिता की दिशा में पहला कदम था। रेणुका रे ने पी. एन. सप्रू और पंडित हृदय नाथ कुंजरू के साथ मिलकर इस विधेयक के लिए संघर्ष किया, लेकिन पिता की संपत्ति में बेटी के उत्तराधिकार का प्रयास विफल रहा। 1947-52 के दौरान यह मुद्दा संविधान सभा में फिर से उठा। कांग्रेस ने उन्हें बंगाल का प्रतिनिधित्व करने के लिए मनोनीत किया, जहां उन्होंने एक व्यापक और सार्वभौम नागरिक संहिता के लिए संघर्ष किया। उनका मानना था कि यह संहिता सभी समुदायों के लिए लागू होने पर महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करेगी।

उन्होंने ज़मींदारी प्रथा के उन्मूलन पर भी क्रांतिकारी विचार व्यक्त किए, लेकिन संविधान सभा में पारित समझौतावादी प्रावधान से वे निराश हुईं। इसी अवधि में उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ के भारतीय प्रतिनिधिमंडल की सदस्य नियुक्त किया गया। वे संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद की तृतीय समिति की तीन महिला सदस्यों में से एक थीं। अन्य दो सदस्य एलेनोर रूजवेल्ट और चिली की अन्ना फिगरेसन थीं।

अंतिम सांस तक सामाजिक सुधार के लिए सक्रिय रही रेणुका रे

1966 में रेणुका रे को अंतरसंसदीय संघ में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया। केंद्रीय विधानसभा में उनकी सदस्यता के दौरान एक महत्वपूर्ण क्षण आया जब बजट पारित करने के लिए सरकार को एक वोट की कमी थी। आई.सी.एस. के वरिष्ठ सदस्यों ने उन पर सरकार के पक्ष में मतदान का दबाव डाला, लेकिन उनके पति ने स्पष्ट कर दिया कि विधानसभा में उनकी पत्नी अखिल भारतीय महिला सम्मेलन का प्रतिनिधित्व कर रही थीं, न कि उनकी। बाद में, जब उनके पति मुख्य सचिव बने और रेणुका राहत और पुनर्वास मंत्री, तो उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता नहीं दी।

1952-57 के दौरान रेणुका पश्चिम बंगाल में शरणार्थी और पुनर्वास मंत्री रहीं। उन्होंने अपने संस्मरण माई रैमिनिसेंस (1982) में इस कार्यकाल की जटिलताओं का वर्णन किया है। विभाजन के बाद, पश्चिम बंगाल और पूर्वी बंगाल के बीच पंजाब जैसी जनसंख्या अदला-बदली नहीं हुई थी। भारत सरकार ने स्थिति को कमतर आंका और पश्चिम बंगाल को शरणार्थियों के लिए पर्याप्त धन नहीं दिया। इसके बावजूद, रेणुका रे को गर्व था कि शरणार्थी शिविरों में संचालित विद्यालय शत-प्रतिशत साक्षरता प्रदान करने में सफल रहे।

1957 में वे मालदा जिले के रतुआ निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की टिकट पर संसद सदस्य चुनी गईं। उन्होंने बंगाली शरणार्थियों के लिए अधिक धन उपलब्ध कराने का प्रयास किया, लेकिन यह सफल नहीं हुआ। उन्होंने प्रजा समाजवादी पार्टी के नाथ पाल और फिरोज गांधी से प्रेरणा ली और वॉयलेट अल्वा तथा सरोजिनी महिषी के साथ घनिष्ठता बनाई। उन्हें योजना आयोग की ‘योजना परियोजना समिति’ के तहत समाज कल्याण और पिछड़ी जातियों के कल्याण के लिए गठित अध्ययन दल की नेता नियुक्त किया गया। इस दल ने 1958-60 के बीच काम किया और दूरगामी सिफारिशों वाला एक महत्वपूर्ण प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

कांग्रेस दल में हो रहे परिवर्तनों से वे असंतुष्ट थीं। पश्चिम बंगाल के कांग्रेस नेताओं ने उनका नाम उम्मीदवार सूची से हटा दिया। नेहरूजी ने हस्तक्षेप कर उन्हें राज्यसभा के लिए नामांकन स्वीकारने का सुझाव दिया, लेकिन रेणुका ने इसे ठुकरा दिया। वे राज्यसभा को अप्रतिनिधि और गरीब देश के लिए महंगा मानती थीं। उन्होंने महिलाओं और सामाजिक सुधारों के लिए काम जारी रखने का निर्णय लिया।

रेणुका रे ने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया और अप्रैल 1997 में अपने निधन तक सामाजिक सुधारों के लिए काम करती रहीं।

Pratyush Prashant

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।

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