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असम की कवयित्री सेनानी नलिनीबाला देवी

नलिनी बाला देवी असमिया भाषा की प्रसिद्ध कवयित्री थीं। अपनी राष्ट्रवादी तथा रहस्यवादी कविता के लिए प्रसिद्ध है। साहित्यक योगदान के लिए भारत सरकार ने पद्म श्री और काव्यकृति अलकनन्दा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार (असमिया) प्रदान किया गया।

नलिनी का जन्म गुवाहाटी के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और लेखन नबीन चंद्र बोरदोलोई के घर हुआ। साहित्यक रूझान के तरफ झुकाव नलिनी का बचपन से ही था।  दस साल के उम्र में उन्होंने कविता लिखी थी पिता शीर्षक से। 12 साल के उम्र में शादी हो गई, चार बच्चे थे पर आठ साल बाद पति का निधन हो गया और दो बच्चे भी खत्म हो गए।

दुख के सिलसिले को कम करने के लिए उन्होंने फिर साहित्य के तरफ रूख किया। देश प्रेम और भक्ति भावनाओं से भरी कविताएं लिखना शुरू किया। पहला कविता संग्रह संध्यार सुर 1928 में प्रकाशित हुआ। गांधीजी के आंदोलन के समर्थन में उन्होंने कुछ महिलाओं के साथ जुड़कर खादी का उत्पादन बढ़ाने के लिए खादी केंद्र खोला।

सन्धियार सुर (१९२८),सपोनर सुर (१९४३),स्मृतितीर्थ (१९४८), परशमणि (१९५४), युगदेवता (१९५७), जागृति (१९६०),अलकानन्दा (१९६७),विश्वदीप(१९७०)अन्तिम सुर, आत्मकथा एरि अहा दिनबोर (१९७६), शान्तिपथ, स्मृति तीर्थ (पिता के जीवन के आधार पर रचित),सरदार बल्लभ भाई पटेल, विश्वदीपा उनका लिखा साहित्य उनके चिरनिद्रा में जाने के बाद भी उनको अमर बना दिया।

Pratyush Prashant

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।

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