जीवन के संगीत पर नाचता इज़ाडोरा डंकन का जीवन

“मैं जीवन में विश्वास करती हूं, प्रेम में, और प्रकृति के नियमों की महानता में” कहने वाली इज़ाडोरा डंकन। उन पर लिखे गए साहित्य में कहा जाता है कि “उनके कदम धरती पर पड़ते ही समूची कायनात उनके साथ थिरक उठती थी। प्रकृति अपने संगीत में झूमने लगता था और दर्शक कहते थे –ओह इज़ाडोरा डंकन तुम्हारी कला ने दुनिया को रोशन कर दिया।”
महालया के मंत्रोच्चार से देश के बड़े भूभाग में दुर्गा पूजा की शुरुआत होती है। पूरे देश में, पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की एक अलग ही पहचान है। यहां की संस्कृति में नव-दुर्गा की उपासना गहराई से रची-बसी है, और इस पर्व का सबसे खूबसूरत पहलू है महिलाओं के बीच सिंदूर खेला का सांस्कृतिक उत्सव।
घर की सीमाओं से बाहर निकलकर, लाल-पाड़े की सफेद साड़ी में सजी महिलाएं सिंदूर के साथ अपने मन, सांसों और धड़कनों को ढोल-नगाड़ों की गूंज में एकाकार कर देती हैं। उनकी थिरकन हर ताल के साथ जैसे मुक्त होती जाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो जीवन ने उनके झोली में कुछ चंद लम्हे थिरकने के लिए दिए हों, जिन्हें वे पूरी तरह से जी लेना चाहती हैं।
पहली बार जब मैंने सिंदूर खेला का यह उत्सव देखा, तो बस देखता रह गया। इससे पहले मेरे मन और मस्तिष्क में महिलाओं के सामूहिक उत्सव की कोई छवि नहीं थी। यदि कहीं थी भी, तो वह सामूहिक न होकर एकांकी रूप में थी—जैसे शब्दों और कल्पना से गढ़ी कोई आकृति। और वह आकृति थी धरती पर थिरकती इच्छाओं का जादू बिखेरती नृत्य-साधिका, इज़ाडोरा डंकन।
इज़ाडोरा डंकन का अभाव में जन्म और संघर्ष बना जीवन
इज़ाडोरा डंकन का जन्म 27 मई 1878 को सैन फ्रांसिस्को के एक साधारण परिवार में हुआ। उनकी मां ने जोसेफ चार्ल्स से प्रेम विवाह किया था, जो उस समय के सामाजिक नियमों के खिलाफ था। आयरलैंड में उनके माता-पिता का प्रेम समाज के मानकों को चुनौती देता था। उनकी मां ने समाज के स्थापित उसूलों के खिलाफ जाकर प्रेम किया और विवाह भी किया, जिससे उनके जीवन में संघर्ष का प्रवेश पहले से ही निश्चित हो गया था।
इज़ाडोरा के पिता न केवल उनकी मां से उम्र में बड़े थे, बल्कि बेहद महत्वाकांक्षी व्यक्ति भी थे। लेकिन जब प्रेम विवाह उनके करियर की राह में बाधा बन गया, तो दोनों ने इज़ाडोरा के जन्म से पहले ही अलग होने का फैसला कर लिया। इस असफल वैवाहिक जीवन और सामाजिक संघर्ष ने इज़ाडोरा के जीवन की नींव रखी, जो बहुत कठोर थी। लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, इज़ाडोरा ने अपना रास्ता नृत्य में खोजा।
बचपन से ही इज़ाडोरा समुद्र की लहरों की धुन और अपनी मां के संघर्षों से प्रेरित थीं। जब वह रोतीं, तो उनकी मां को उनके रुदन में भी एक लय सुनाई देती। धीरे-धीरे इज़ाडोरा ने अपनी मां से यह सीखा कि दुःख के संगीत में भी सुख के छोटे-छोटे टुकड़े कैसे ढूंढे जा सकते हैं।
अभावों के बावजूद खुशी से जीने का पाठ इज़ाडोरा ने जैसे अपनी मां के गर्भ में ही सीख लिया था। गर्भावस्था के दौरान कम पोषण के कारण उनकी हर हलचल जैसे उनके नृत्य की पहली पाठशाला बन गई। पालने में झूलते हुए, जब लोग उन्हें खेलाते या झुलाते, तो उनके चेहरे के भाव लोगों को आश्चर्यचकित कर देते। बचपन में, खेलकूद के दिनों में, इज़ाडोरा ने नृत्य और संगीत के प्रति गहरी रुचि विकसित कर ली। वह आसपास के बच्चों को इकट्ठा करके उन्हें नृत्य की विभिन्न मुद्राएं सिखातीं।
उनकी मां ने जब यह देखा, तो पूछा, “यह सब क्या है?” इज़ाडोरा ने सहजता से जवाब दिया, “मैं बच्चों को नाचना सिखा रही हूं।” उनकी मां ने पियानो पर धुन बजाना शुरू किया, और इज़ाडोरा उस पर झूमने लगीं। धीरे-धीरे, लोग इसके लिए पैसे देने लगे, और यह उनकी कमाई का छोटा-सा जरिया बन गया।
दस साल की उम्र तक इज़ाडोरा ने पढ़ाई छोड़कर पूरी तरह नृत्य पर ध्यान केंद्रित कर लिया। उनकी लगन और प्रतिभा के कारण सैन फ्रांसिस्को के अमीर परिवारों से भी नृत्य सिखाने के प्रस्ताव आने लगे।
इज़ाडोरा डंकन का आधुनिक नृत्य और दुनिया

इज़ाडोरा डंकन ने अपने नृत्य के माध्यम से पूरी दुनिया में अपनी अनोखी पहचान बनाई, लेकिन यह सफर चुनौतियों से भरा हुआ था। शिकागो की सड़कों से शुरू हुआ उनका संघर्ष कभी शिखर तक पहुंचता, तो कभी उन्हें गलियों में भटकने पर मजबूर कर देता। अपनी मां, भाई और बहन के साथ, इज़ाडोरा एक शहर से दूसरे शहर और एक देश से दूसरे देश जातीं। अपनी कला के जरिए लोगों का दिल जीत लेतीं, लेकिन जीवन की उथल-पुथल उन्हें अवसाद की ओर धकेल देती। उनके जीवन में आए प्रेमियों और उनके साथ बने संबंधों ने उन्हें लगातार आलोचनाओं के घेरे में रखा।
सैन फ्रांसिस्को में एक थिएटर ने उनका पहला नृत्य प्रदर्शन देखा और टिप्पणी की, “इस तरह की चीज़ थिएटर में नहीं चलती।” आर्थिक तंगी के कारण मजबूर होकर उन्होंने थिएटर के मैनेजर से पूछा कि वह किस प्रकार का नृत्य चाहते हैं। मैनेजर ने “तड़क-भड़क और लटके-झटके” वाले नृत्य की मांग की। भूख से लड़ती इज़ाडोरा ने इस मांग को स्वीकार कर लिया और किसी तरह दाने-दाने को मोहताज होने से बच गईं।
शिकागो के “बोहेमिया क्लब” में उनके नृत्य प्रदर्शन को कवियों, चित्रकारों, अभिनेताओं और देश-विदेश के प्रभावशाली लोगों ने खूब सराहा। यहीं उन्हें न्यूयॉर्क जाने की सलाह मिली। इसी क्लब में इज़ाडोरा की मुलाकात अमेरिका के कला-प्रेमी और सौंदर्य के पारखी ऑगस्टिन डाली से हुई, जिन्होंने उन्हें अपने नाटक में एक छोटा-सा रोल दिया और उनके साथ अनुबंध किया।
न्यूयॉर्क में, इज़ाडोरा को शिकागो से बड़ा मंच मिला, लेकिन दो वर्षों तक उनके नृत्य प्रदर्शन उन्हें संतोष नहीं दे सके। उन्होंने थिएटर छोड़ दिया और घर पर एथलबर्ट के संगीत पर अभ्यास शुरू कर दिया। जब एथलबर्ट को इस बात का पता चला, तो उन्होंने इसे लेकर अपनी नाराज़गी जताई। इज़ाडोरा ने उनसे निवेदन किया कि वे कम से कम एक बार उनके नृत्य को देखें और यदि उन्हें पसंद न आए, तो वह एथलबर्ट के संगीत का उपयोग नहीं करेंगी।
एथलबर्ट ने जब इज़ाडोरा का नृत्य देखा, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “तुम देवी हो, अप्सरा हो! जब मैं यह धुन बना रहा था, तो मेरे मन में यही कल्पनाएं थीं।”
इसके बाद, संगीत और नृत्य के कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसने न्यूयॉर्क में धूम मचा दी। इज़ाडोरा के प्रदर्शन अब थिएटर और बड़े आयोजनों से होते हुए संभ्रांत घरों तक पहुंच गए। उनका भाग्य न्यूयॉर्क से लंदन की ओर उड़ान भरने के लिए तैयार था। इसके बाद, शहर-दर-शहर और देश-दर-देश उनकी यात्रा चलती रही, और इज़ाडोरा ने अपनी कला से पूरी दुनिया को मुग्ध कर दिया।
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इज़ा का वैवाहिक जीवन
अपनी अप्रतिम नृत्य कला से जहां इज़ाडोरा डंकन ने पूरी दुनिया में ख्याति अर्जित की और कला के क्षेत्र में असाधारण ऊंचाइयां छुईं, वहीं उनके व्यक्तिगत जीवन में हमेशा उथल-पुथल बनी रही। उनके जीवन में उनकी मां, भाई और बहनों का सहयोग कभी कम नहीं हुआ, लेकिन प्रेम संबंधों में स्थिरता उन्हें कभी नहीं मिली।
पोलिश चित्रकार इवान मिरोस्की, हंगेरियन अभिनेता ऑस्कर बरज़ी, इतिहासकार हेनरीख थोड और मंच सज्जाकार गॉर्डन क्रेग उनके जीवन में महत्वपूर्ण रहे। गॉर्डन क्रेग से उन्हें उनकी पहली संतान, द्रेद्रे का जन्म हुआ। हालांकि, इज़ाडोरा अपने प्रेमियों के जीवन में आने-जाने से अधिक विचलित नहीं हुईं, क्योंकि वह अपने काम में पूरी तरह व्यस्त रहती थीं।
लेकिन एक कार दुर्घटना में अपने बच्चों की मौत का सदमा ऐसा था, जिसे इज़ाडोरा कभी भुला नहीं पाईं। इस आघात से उबरने की कोशिश में वह फिर गर्भवती हुईं, लेकिन तीसरा बच्चा भी जीवित नहीं रहा। इन त्रासदियों ने उन्हें गहरे अवसाद में धकेल दिया, और उनके मन में मृत्यु के विचार घर करने लगे।
इन सभी दर्दनाक अनुभवों के बावजूद, इज़ाडोरा ने नृत्य करना नहीं छोड़ा। विवाह संबंधों में स्थिरता की कमी और अपने व्यक्तिगत जीवन के कारण वह हमेशा आलोचनाओं का केंद्र बनी रहीं।
लेखिका इ़ज़ा
इज़ाडोरा डंकन ने अपने कला के सफर में दुनिया के महानतम कलाकारों से मुलाकात की। उनकी आत्मकथा “माई लाइफ” में महान कवियों, नाटककारों, संगीतज्ञों, पेंटरों, मूर्तिकारों, दार्शनिकों और राजनीतिक हस्तियों के बारे में विस्तृत विवरण मिलता है।
स्कूल न जा पाने के बावजूद, लाइब्रेरी में पढ़ाई की आदत ने उन्हें अपने समय की कला और राजनीति के हर क्षेत्र में गहरी समझ और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया। उनकी आत्मकथा केवल इन महान व्यक्तियों से परिचय ही नहीं कराती, बल्कि उनके जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं और विचारों पर गहन विमर्श भी करती है।
यह आत्मकथा अपने पाठकों को इस तरह बांध लेती है, जैसे इज़ाडोरा स्वयं उनके साथ नृत्य कर रही हों। यह उनकी लेखन शैली की रचनात्मकता और गहराई को दर्शाता है।
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इज़ा और सिंदूर खेला
इज़ाडोरा डंकन का पूरा जीवन नृत्य के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक है। यह बंगाली महिलाओं के दुर्गा अष्टमी के दिन सिंदूर खेला में उनके झूमने-थिरकने की तरह हमें यह संदेश देता है कि चाहे इज़ाडोरा जैसी अद्वितीय नृत्यांगना हो या आम महिला, किसी का भी जीवन खाली डब्बा नहीं है।
हर जीवन के भीतर कुछ ऐसा है जो स्वयं को तलाशना, साबित करना और अपनी मंज़िल पाना चाहता है।फिर भी, अधिकांश महिलाओं का जीवन इज़ाडोरा की तरह स्वतंत्र निर्णय लेने या यात्री की भांति सफर करते हुए गिरने और उठने की आज़ादी से वंचित है।
वे इज़ाडोरा की तरह अपने शर्तों पर जीवन नहीं जी सकतीं। लेकिन, नेमत से मिले क्षणों में झूमने और थिरकने की आज़ादी वे ज़रूर महसूस कर सकती हैं। यही उनकी संजीवनी है, उनकी पहचान है।

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।