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एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है: एक सोची समझी साज़िश

हमें अक्सर कुछ उदार पुरुषों की  टिप्पणी देखने को मिल जाती हैं, “एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है”…लेकिन इस टिप्पणी के रचियता कौन हैं? 

हमें अक्सर कुछ उदार पुरुषों की  टिप्पणी देखने को मिल जाती हैं, “एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है”…लेकिन इस टिप्पणी के रचियता कौन हैं

सोशल मीडिया पर चाहे महिलाओं के सफलता के कहानियों का स्टेट्स हो या किसी महिला के साथ हुए अन्याय के या किसी महिला का स्वतंत्र और अपनी खुदमुख्तारी का स्टेट्स, अक्सर कुछ उदार पुरुषों की  टिप्पणी देखने को मिल जाती हैं, “एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है!”

उपरी  तौर पर सरसरी निगाह से यह धारणा एक दफा तर्क-संगत सी प्रतीत होती है क्योंकि हम अपने घर-परिवार, आस-पड़ोस-मोहल्लों बहुत हद तक यह देखते भी हैं।

घर में लड़कियों के प्रति उपेक्षा का जो भाव घर में ही  महिलाओं से ही देखने को मिलता है, उससे भी कई बार यह बात सत्य होती हुई दिखती है। कभी वह सास या कभी ननद या कभी भाभी तो कभी मालकिन के रूप में महिलाओं के विरुद्ध खड़ी हुई दिखती है। इसलिए महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन होती हैं, यह सच लगने लगता है।

एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है, किसने बनाया?

आखिर वह कौन सी वज़ह रही होगी, जो महिलाएं ही महिलाओं के विरुद्ध खड़ी हो गई होंगी? इस सवाल के जवाब को तलाशने की शुरूआत करें तो कई तथ्य मिलते हैं, जिन पर कभी ध्यान ही नहीं जाता।

हम सामाजिक सत्ता का प्रभुत्व और उसके दवाब जैसे सवाल की तरफ हम कभी देख ही नहीं पाते हैं।

आखिर वह कौन सी सत्ता है जिसका सबसे अधिक फायदा महिलाओं का महिलाओं के विरुद्ध होने से है?

आखिर वह कौन सी शक्ति है जो महिलाओं के महिलाओं के खिलाफ करने के लिए शिकारी के तरह जाल बिछाती है और महिलाओं को उलझाकर रखती है।

गोया महिलाओं के ऊपर ही यह सवाल डालकर उनको खामोश कर दिया जाता है क्योंकि उनको पता ही है कि पुरुषवादी सत्ता-सरंचना कैसे उनको महिलाओं के विरुद्ध इस्तेमाल करता है। उनको ही महिलाओं के बरक्स ला खड़ा कर देता है एक टूल के रूप में इस्तेमाल करके।

पर इस सवाल का जवाब तक पहुंचने के लिए हमको समाज की संरचना के तहों को देखना होगा। जाहिर सी बात है, पुरुषवादी सत्ता और वर्चस्वशाली सत्ता का अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए में सबसे अधिक फायदा है। इसलिए महिलाओं के आर्थिक-सामाजिक असुरक्षा बोध का इस्तेमाल वह महिलाओं के खिलाफ करता है और महिलाओं के तमाम स्थितियों को नियंत्रित करता है।

महिलाएं अपने आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक अस्मिता के अभाव में हमेशा असुरक्षा के यथास्थिति में होती है, इसलिए वह अपने आसपास की महिलाओं पर अपना नियंत्रण स्थापित कतना चाहती हैं और दूसरी महिला के विरुद्ध हो जाती हैं।

महिलाएं तो बस निमित मात्र है असली कर्त्ता  तो पुरूष हैं

 ऐसा नहीं है कि महिलाएं ही महिलाओं की विरोधी होती हैं। यह किसी एक महिला के साथ जुड़ा हुआ सच है। जिस वर्ग के साथ यह सवाल सबसे ज्यादा पैबंद होता है, वह है मध्य वर्ग और मध्य वर्ग अपने से ऊपर के वर्ग की ही भांति पुरुष नियंत्रित है।

सरसरी निगाहों से दोनों ही वर्ग के घरों में महिलाएं ही निर्णय की भूमिका में दिखती हैं, पर सच्चाई इसके विपरीत है। अपवादों को छोड़ दें तो असल में हमारे घरों के अधिकांश निर्णय पुरुषों के द्वारा तय हो चुके होते हैं। महिलाओं के हिस्से उसको बस अमल में लाना होता है।

लड़की पढ़ेगी या नहीं पढ़ेगी, उसे क्या खाने को मिलेगा और क्या नहीं, वह क्या पहनेगी क्या नहीं, उसे बड़े बाल रखने चाहिए या छोटे, वह किस घर ब्याही जायेगी, उसे नौकरी करने के लिए जाना है या नहीं, उसे आत्मनिर्भर बनने यानी अपने पैरों पर खड़े होने का अधिकार है या नहीं, यह सब कुछ पुरुष ही तय करता है। महिलाओं से केवल सलाह ली जाती है पर अंतिम निर्णय तो पुरुष के ही हाथों में होता है, क्योंकि हमारा मध्यवर्गीय समाज अंतत: तो पुरुष वर्चस्व वाला ही है।

जब सारे निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों का है महिलाएं उसको बस लागू करने के भूमिका में है तो फिर महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन कैसे हुईं? ये तो पुरुषों के निर्णय के सामने चाभी की गुड़िया मात्र हैं, जो पुरुषों के साथ इसलिए खड़ी हैं क्योंकि व्यक्तिगत संपत्ति के अभाव में उसके स्वयं के जीवन के लिए, उसके पास कभी कोई विकल्प था ही नहीं।

आदिम व्यवस्था को हम युगों पीछे छोड़ आए हैं, किंतु आचार-व्यवहार, नियम-कायदों की जो व्यवस्था हमने विकसित की है वह सोचने को बाध्य करती है कि हमने कहीं एक असंतुलित और पुरुष नियंत्रित व्यवस्था तो विकसित की है।

हमने अपने रहन-सहन को भौतिक सुविधाओं से लैस कर दिया है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने हमारे जीवन को सरल-सुगम बना दिया है। परंतु हमारे आचार-व्यवहार, नियम-कायदों में न ही तर्कपूर्ण बन सके न ही वैज्ञानिक चेतना से लबरेज़। हम समाज को व्यवस्थिति रखने के लिए जो भी कानून बनाये हैं वह पूर्वाग्रह पर अधिक आधारित हैं, इसलिए वह महिलाओं के हित में कम पुरूषों के पक्ष में ज्यादा है।

जब सत्ता, शक्त्ति और हर चीज पर नियंत्रण पुरुषों का ही है, तो फिर महिलाएं महिलाओं के विरूद्ध हो नहीं सकती, वह तो बस निमित मात्र हैं। असली कर्ता तो पुरूषवादी विचार है, जो अपनी पुरुषसत्ता के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए तमाम सामाजिक ताने-बाने को रच रहा है।

मूल चित्र : gawrav from Getty Images Signature, Canva Pro

Pratyush Prashant

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।

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