प्रेम क्या है...प्रेम न जाति देखता है, न धर्म देखता है, न कोई ऊंच-नीच देखता है, न कोई भेदभाव करता है और न ही किसी परंपरा से इसका कोई लेना-देना होता है...
समग्र जीवन का प्रतिबिंब है प्रेम...अहंकार से मुक्त मन ही वास्तविक प्रेम की समग्र अनुभूति पा सकता है।
क्रांतिकारी होता है प्रेम... प्रेम क्रांतिकारी चरित्र हमेशा ही व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा दिखता रहा है। समाज के नियम समतामूलक हो जाएं, तो प्रेम का क्रांतिकारी चरित्र भी जाता रहेगा।
समतामूलक समाज बनाता है प्रेम...प्रेम समतामूलक समाज के निमार्ण में सबसे ठोस कदम है, इसमें शामिल लोग अपनी रूढ़ियों से मुक्त होकर एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए दृढ़संकल्प हों
समग्र जीवन का प्रतिबिंब है प्रेम...प्रेम, जीवन से अलग कोई परिघटना नहीं है, बल्कि यह समग्र जीवन का प्रतिबिंब है।
प्रेम को लेकर जैसा आपका नज़रिया होगा, आपका जीवन भी वैसा हो जाएगा, इसमें घालमेल आपके जीवन को अस्त-व्यस्त कर सकता है।