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जब मिर्ज़ा ग़ालिब ने दिल्ली कॉलेज की नौकरी ठुकरा दी

मिर्ज़ा ग़ालिब को एक महान कवि के रूप में पहचान मिलना एक बात है, लेकिन आरामदायक जीवन जी पाना एक बिल्कुल अलग चुनौती रही। ग़ालिब के आर्थिक संसाधन हमेशा उनकी जरूरतों से कम रहे। उनकी मां, जब तक जीवित रहीं, उन्हें आर्थिक सहायता देती रहीं। हालांकि, हमें यह निश्चित रूप से ज्ञात नहीं कि उनकी मां का निधन कब हुआ, लेकिन कुछ परिस्थितिजन्य प्रमाणों से संकेत मिलता है कि यह दुखद घटना संभवतः 1840 में हो चुकी थी। उनकी मां की सहायता बंद होने के बाद, ग़ालिब की आर्थिक परेशानियां और बढ़ गईं।

लंबी मुकदमेबाजी ने उनकी आर्थिक स्थिति को न केवल और बदतर कर दिया, बल्कि उन पर कर्ज का बोझ भी बढ़ा दिया। इस स्थिति में, ग़ालिब और उनके दोस्तों के लिए यह आवश्यक हो गया कि वे अतिरिक्त आर्थिक साधनों की तलाश करें, ताकि उनकी चिंताओं में कुछ कमी आ सके।

दिल्ली कॉलेज से फ़ारसी पढ़ाने का बुलावा

मिर्ज़ा ग़ालिब को दिल्ली कॉलेज से फ़ारसी पढ़ाने का बुलावा आया, जो उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस प्रस्ताव ने न केवल उनकी विद्वता को मान्यता दी, बल्कि उन्हें एक स्थायी आय का साधन भी प्रदान करने का अवसर दिया। हालांकि, ग़ालिब ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने में संकोच किया।

1840 में एक ऐसा अवसर आया भी, लेकिन ग़ालिब उससे लाभ उठा पाने में असफल रहे। दिल्ली कालेज के विज़िटर जेम्स थॉमसन कालेज के मुआइने के लिए आए। उन्होंने कहा कि कालेज में फ़ारसी की शिक्षा की कोई सन्तोषप्रद व्यवस्था नहीं है और सिफारिश की कि इस कमी को दूर किया जाना चाहिए।

किसी ने उनको मुझाया कि इस समय दिल्ली में फ़ारसी के प्रसिद्ध विद्वान इमामबख्श सहबाई, और इनमें से किसी को भी इस काम के लिए राजी किया जा सकता है। थॉमसन ने पहले गालिब को मिलने के लिए बुलाया। थॉमसन भारत सरकार के सचिव थे और ग़ालिब को जानते थे। गालिब को सरकारी दरबारों में ‘कुर्सीनशीन’ का ओहदा मिला हुआ था और इस नाते वे थॉमसन से पहले भी मिल चुके थे।

थॉमसन के अनुरोध के उत्तर में ग़ालिब हमेशा की तरह अपनी पालकी में उनके घर पहुंचे। वहां वे फाटक पर ही रुक गए और इन्तज़ार करने लगे कि कोई बाहर आकर उनका स्वागत करे तो वे भीतर जाएं।जिन लोगों को गवर्नर-जनरल के दरबार में सम्मान का स्थान प्राप्त था, उनके लिए उस समय यही आम रिवाज़ था।


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हाथ आई नौकरी ग़ालिब ने ठुकरा दी

ग़ालिब इन्तज़ार करते रहे और उनके स्वागत के लिए कोई बाहर नहीं निकला। थोड़ी देर बाद थॉमसन स्वयं बाहर आए और उन्होंने गालिब से पूछा कि आप पालकी से उतरकर भीतर क्यों नहीं आ गए। जब  ग़ालिब ने अपनी समस्या बताई तो थॉमसन ने कहा कि आपका औपचारिक स्वागत तो तभी किया जा सकता है जब आप सरकारी अतिथि के रूप में आएं।

इस समय आप दिल्ली कालेज में नौकरी प्राप्त करने के उद्देश्य से मुझसे मिलने आए हैं, इसलिए आपको परम्परागत स्वागत प्राप्त करने का हक नहीं है। इस पर ग़ालिब की प्रतिक्रिया बड़ी तीखी रही।

उन्होंने कहा कि मैं दिल्ली कालेज की नौकरी के सिलसिले में आपसे इसी उम्मीद से मिलने आया हूं कि इससे मेरा रुतबा बढ़ेगा और अपने देशवासियों और ब्रिटिश अधिकारी वर्गों की नज़रों में मेरी इज्ज़त बढ़ जाएगी न कि इसलिए कि मेरी इज्ज़त और भी गिर जाए।

 इस नौकरी को स्वीकार करने का मतलब यह है कि मैं उस इज़्ज़त से हाथ धो बैठं जो मुझे इस समय प्राप्त है, तो फिर मैं इसे अस्वीकार करना ही पसन्द करूंगा। यह कहकर वे अपनी पालकी में आ बैठे और वापस घर लौट आए।


जब मिर्जा ग़ालिब ने कलकत्ते की यात्रा की


आर्थिक कठिनाइयों ग़ालिब के बाद भी नहीं झुके

1806 में उनके ताऊ की मृत्यु हुई थी तब नौ साल की उम्र से ही उन्हें अंग्रेज़ों से पेन्शन मिल रही थी। हर बार जब भी वे सरकारी दरबार में शरीक होते थे, तो सदारत करने वाले अधिकारी की प्रशंसा में ‘क़सीदा’ लिखते थे और सम्भवतः उसे दरबार में सुनाते भी थे। वे अपने आपको फ़ारसी के उस्ताद और अधिकारी विद्वानं मानते थे। इस सब के आर्थिक रूप से बड़ी तंगी की हालत में रह रहे थे।

इस स्थिति में सामान्यतः कोई भी यह उम्मीद बावजूद वे कर सकता था कि वे इस अवसर को नहीं खोएंगे और कालेज की नौकरी स्वीकार कर लेंगे क्योंकि इससे उनके ब्रिटिश संरक्षक तो प्रसन्न होते ही, फारसी के विद्वान के रूप में उनकी ख्याति भी दृढ़ हो जाती और बदले में उन्हें अपनी आर्थिक कठिनाइयों से भी मुक्ति मिल जाती।

इतने सारे लाभ होने की स्पष्ट सम्भावना के बावजूद उन्होंने गर्व के साथ उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और परिणाम की ज़रा भी परवाह नहीं की और वह भी केवल इतनी-सी बात पर कि जब वे थॉमसन के घर पहुंचे तो उन्होंने उनका ढंग से स्वागत नहीं किया।

इस निर्णय के परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हो सका, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। यह घटना ग़ालिब के स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर स्वभाव को बखूबी उजागर करती है।


संदर्भ

मालिक राम, मिर्ज़ा ग़ालिब, अनु. श्रीकान्त व्यास, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया

Pratyush Prashant

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।

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