पत्रकारिता में रूचि रखने वाली क्रांतिकारी- कमला दासगुप्ता

बाग्लादेश(ढ़ाका) के बिक्रमपुर में 11 मार्च 1907 को सुरेन्द्रनाथ दास गुप्ता के घर पैदा हुई, महान क्रांतिकारी और पत्रकारित में रूचि रखने वाली कमला दास गुप्ता। कोलकाता विश्वविद्यालय के बैथून कांलेज से इतिहास में स्नातक की पढ़ाई की। विश्वविद्यालय में ही देशभक्ति की भावना जागृत हुई और महात्मा गांधी से बेहद प्रभावित हुई। गांधीजी के साथ स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय होना चाहती थी पर पिताजी से अनुमति नहीं मिली।
घर में रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहना संभव नहीं था इसलिए घर छोड़कर गरीब महिलाओं के छात्रावास में प्रबन्धक के रूप में नौकरी शुरू कर दिया। कई बार क्रांतिकारी गतिविधियों में पकड़ी भी गई पर सबूतों के अभाव में बरी कर दी गई। बंगाल के गर्वनर पर गोली चलाने वाली क्रांतिकारी महिला बीना दास को रिवाल्वर उन्होंने ही उपलब्ध करवाया था। 1933 में आखिरकार पुलिस कमला दास गुप्ता को जेले के सलाखों के पीछे भेजने में सफल हुई। 1936 में उनको रिहा किया गया पर घर पर नज़रबंद कर दी गई।

1938 में वह कांग्रेस से जुड़ गई और भारत छोड़ो आंदोलन में फिर गिरफ्तार कर लिया गया।जब जुगान्तर पार्टी कांग्रेस के साथ जुड़ गई तब कमला ने भी अपनी निष्ठा गांधीजी के प्रति समर्पित कर दी। विशेष रूप से 1942 और 1943 के बर्मी शरणार्थियों के साथ और 1946-47 में सांप्रदायिक दंगों के शिकार लोगों के साथ। वह नोवाखाली में राहत शिविर की प्रभारी थीं, जहां गांधी ने 1946 में दौरा किया था।
पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि थी।कई वर्षों तक उन्होंने अभूतपूर्व महिला पत्रिका “मंदिर” का संपादन किया। उन्होंने बंगाली में दो संस्मरण लिखे, रक्तेर अक्षरे (रक्त के अक्षरों में, 1954) और स्वाधीनता संग्रामे नारी (स्वतंत्रता संग्राम में महिलाएं, 1963)। 19 जुलाई 2000 को कोलकत्ता में उनका निधन हो गया।

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।