BiographyMotivationalPoemsSocietyWorld

जब मिर्जा ग़ालिब ने कलकत्ते की यात्रा की

मिर्जा ग़ालिब ने 1827-1828 में दिल्ली से कलकत्ता की यात्रा की, जो उनके जीवन की सबसे लंबी और कठिन यात्राओं में से एक थी। इस यात्रा के पीछे मुख्य कारण उनकी पेंशन का मामला था, जिसे अंग्रेजी सरकार ने रोक दिया था। ग़ालिब ने अपनी पेंशन बहाल करवाने के लिए गवर्नर-जनरल की कौंसिल के सामने दरख्वास्त पेश करने का निर्णय लिया।

कलकत्ता में ग़ालिब का अनुभव विशेष था। वह संभवतः बैथेन रो के मकान नंबर 133 में ठहरे, जो एक हवेलीनुमा इमारत थी। यहां से शहर का दृश्य उन्हें बेहद भाया, और उन्होंने अपने अनुभवों को अपनी शायरी में खूबसूरती से उकेरा। कलकत्ता उस समय एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र था, जिसने ग़ालिब पर गहरी छाप छोड़ी।

“कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तू ने हम-नशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाए हाए”

कलकत्ता में ग़ालिब

ग़ालिब, कानपुर, लखनऊ, बांदा, इलाहाबाद, बनारस और मुर्शिदाबाद जैसे स्थानों से होते हुए, एक लंबी और कठिन यात्रा पूरी करने के बाद 1828 की फरवरी की शुरुआत में कलकत्ता पहुंचे। उन्होंने अप्रैल के अंत में गवर्नर-जनरल की कौंसिल के सामने अपनी पहली दरख्वास्त पेश की। इस दरख्वास्त में उन्होंने अपनी मांगें रखीं:

(1) लॉर्ड लेक ने मई 1806 में स्वर्गीय नसरुल्लाबेग खां के परिवार के भरण-पोषण के लए 10,000 रुपये वार्षिक की सहायता मंजूर की थी। इसमें से अब तक सिर्फ 5,000 रुपये की रकम ही दी जाती रही है। 10,000 रुपये की मूल रकम अदा करने का हुक्म दिया जाए।
(2) यह पेन्शन नसरुल्लाबेग खां के परिवार के लिए मंजूर हुई थी। लेकिन एक बाहरी आदमी (ख्वाजा हाज़ी) को, जिसका नसरुल्लाबेग खां से या उनके परिवार से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं था, पेन्शन के हिस्सेदारों में शरीक कर दिया गया था और अब उसके मर जाने के बाद उसके दो लड़कों को अपने बाप का हिस्सा अदा किया जा रहा है। इसको बंद किया जाए।
(3) मूलरूप से मंजूर किए गए 10,000 रुपये और वास्तव में अदा किए गए 5,000 रुपये के बीच 5,000 रुपये वार्षिक का जो अंतर पड़ा है, उसका हिसाब लगाया जाए और बक़ाया रकम परिवार को अदा कर दी जाए। इसमें 2000 रुपये वार्षिक की वह रकम भी शामिल ही जानी चाहिए, जो गलती से खवाजा हाजी को अदा की जाती रही है।
(4) अब भविष्य में पेन्शन फिरोज़पर झिरका राज्य की बजाय ब्रिटिश खजाने से अदा की जानी चाहिए।

गालिब ने यह सिद्ध करने के उद्देश्य से कि 10,000 रुपये का उनका दावा और बकाया रकम की अदायगी की उनकी दरख्वास्त न्यायोचित है, यह तर्क पेश किया कि यह दूसरा हुक्मनामा जाली है या किसी संदेहास्पद सूत्र से प्राप्त किया गया

ग़ालिब का तर्क इतना सुसंगत था और ठोस तथ्यों पर आधारित था कि भारत सरकार के मुख्य-सचिव जॉर्ज स्विंटन को पूरा विश्वास हो गया कि नवाब द्वारा पेश किया दस्तावेज़ सच्चा नहीं है और इसलिए ग़ालिब का दावा स्वीकार किया गया था, उस समय सर जॉन मैल्कम लॉर्ड लेक के सचिव थे। अब वे बम्बई में लेफ्टिनेंट गवर्नर थे। यह दस्तावेज़ उनकी राय जानने के लिए उनके पास भेजा गया।

सर जॉन मैल्कम ने ग़ालिब के तर्कों पर ध्यान देने की बजाय यह विचार प्रकट किया कि नबाव अहमदबख्श खां एक सम्मानित व्यक्ति थे और लॉर्ड लेक के पूर्ण विश्वासपात्र थे, इसलिए इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वे इतने नीचे उतरेंगे और ऐसा जाली दस्तावेज़ तैयार करेंगे। अपने तर्क को इस तथ्य पर आधारित करते हए सर जॉन मैल्कम ने निर्णय दिया कि यही दस्तावेज़ ठीक होगा और सबूत के रूप में इसी को स्वीकार किया जाना चाहिए।

इस पर गवर्नर जनरल की कौंसिल ने निर्णय दिया कि सरकार वर्तमान व्यवस्था में किसी प्रकार के रद्दोबदल को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।  ग़ालिब का मुकदमा खारिज कर दिया गया। गालिब ने गवर्नर जनरल की कौंसिल के अंतिम फैसले का इन्तज़ार नहीं किया। वे कलकत्ता से चल दिए और 1829 के नवम्बर के अन्त में दिल्ली लौट आए। फिर भी उसकी यह कलकत्ता यात्रा अनेक कारणों से उनके जीवन में महत्वपूर्ण सिद्ध हुई ।

 

कलकत्ता में साहित्यिक विवाद

गालिब के कलकत्ता पहुंचने के कुछ ही समय बाद कलकत्ता कालेज के साहित्यिक समाज ने एक साहित्य गोष्ठी और मुशायरे का आयोजन किया। ग़ालिब  ने भी इसमें भाग लिया और अपनी दो फारसी गजलें पढ़ीं। कलकत्ता के अधिकांश शायर या तो मुहम्मद हसन ‘कतील’ के शागिर्द थे या उनके पक्के समर्थक थे। जब ग़ालिब   ने अपनी गजलें पढ़ी तो कतील का प्रमाण देते हुए कुछ लोगों ने उनकी कछ विरोधी आलोचना की।

ग़ालिब  ने कभी भी भारत के फारसी विद्वानों को मान्यता नहीं दी थी। उनका कहना था कि गहरे अध्ययन और कठोर परिश्रम से किसी भी भाषा को सीखा जा सकता है ओर उस पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन जब यह सवाल उठता है कि कौन-सा प्रयोग और मुहावरा शुद्ध है तो केवल उस विशिष्ट देश के विद्वान या उनकी रचनाओं को ही प्रमाण माना जा सकता है। उस देश के बाहर लोगों को,चाहे वे कितने ही बड़े पंडित क्यों न हो, इस सम्बन्ध में अन्तिम और आधिकारिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

उनका विचार था कि चूंकि कतील भारती हैं, इसलिए उनकी रचनाओं को प्रमाण मानकर यह तय नहीं किया जा सकता कि मेरा कोई प्रयोग गलत है या सही है। ग़ालिब  के इस कथन से श्रोता लोग भड़क उठे क्योंकि उनकी नज़रों में कतील का फारसी के एक शायर और उस्ताद के रूप में बड़ा मान था। फलस्वरूप ग़ालिब   की बड़ी कड़ी आलोचना और निन्दा होने लगी।

उन्हें अपने विरोधी लोगों के मौखिक और मुद्रित आरोपों और आलोचनाओं का उत्तर देना पड़ा। किसी तरह विरोध थोड़ा-बहुत कम हुआ लेकिन बिल्कुल समाप्त कभी नहीं हो सका। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का उनके साहित्यिक जीवन पर स्थायी प्रभाव पड़ा और जैसे-जैसे समय बीतने लगा, भारत के फ़ारसी के विद्वानों के प्रति उनकी कटुता और उपेक्षा की भावना बढ़ती ही गई।


जीवन के संगीत पर नाचता इज़ाडोरा डंकन का जीवन


कलकत्ता का सांस्कृतिक प्रभाव

कलकत्ता की इस यात्रा का दूसरा परिणाम यह निकला कि जीवन के प्रति ग़ालिब  के दृष्टिकोण पर एक स्वस्थ प्रभाव पड़ा। उस समय कलकत्ता भारत का सबसे ज्यादा विकसित और आगे बढ़ा हुआ शहर था। अंग्रेजों का राज कायम होने के कारण वहां बहुत-से आधुनिक और नवीनतम वैज्ञानिक आविष्कारों का आम प्रचलन हो गया था। संसार के कोने-कोने से जहाज़ सुदूर देशों का माल और तिजारती सामान लादकर कलकत्ता के बंदरगाह में पहुंचते रहते थे। इससे वहां हर समय एक चहल-पहल बनी रहती थी।

कलकत्ता में रहने वाले अंग्रेजों ने भी वहां के स्थिर और श्लथ पौर्वात्य वातावरण में बहुत अधिक परिवर्तन उपस्थित कर दिया था। वहां उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में स्थापित हुए पोर्ट विलियम कालेज ने उर्दू में अनेक मौलिक पुस्तकों के प्रशासन के साथ ही अंग्रेजी तथा कुछ पूर्वीय भाषाओं के अनुवाद भी प्रकाशित किए थे। इनसे उर्दू गद्य में एक नई शैली की शुरुआत हुई थी। इसके अलावा कलकत्ता में ईरानी व्यापारी ओर यात्री भी काफी बड़ी संख्या में रहते थे।

ग़ालिब  इनके सम्पर्क में आए और इस प्रकार उन्हें आधुनिक फ़ारसी का ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिला। इन सब बातों का उन पर यह सम्मिलित प्रभाव पड़ा कि न केवल साहित्य के प्रति, बल्कि पूरे जीवन के प्रति, जीवन के सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक पहलुओं के प्रति उनके दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन आया।


यह वेबसाईट आपके ही सहयोग से चलती है। 

वेबसाइट को SUBSCRIBE करके

भागीदार बनें।


कलकत्ता यात्रा में ग़ालिब को बौद्धिकं लाभ हुआ

अपनी इस लम्बी और असुविधापूर्ण यात्रा के प्राथमिक उद्देश्य में भले ही वे असफल रहे हों, लेकिन बौद्धिकं दृष्टि से और सामान्य ज्ञान की दृष्टि से उन्हें बड़ा लाभ प्राप्त हुआ। फारसी के प्रभाव के कारण उर्दू गद्य अब भी फारसी के मुहावरों और शब्दों की भरमार से बोझिल था। वैसे यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि उस समय के अधिकांश उर्दू लेखकों की शिक्षा-दीक्षा फारसी में हुई थी और हालांकि परिस्थितियों के प्रभाव से उन्होंने उर्दू में लिखना शुरू कर दिया था लेकिन अब भी इस नई भाषा को वे बहुत सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पा रहे थे।

उनके लेखन का अधिकांश अब भी फारसी में ही होता था तथा उर्दू को अभिव्यक्ति का माध्यम स्वीकार कर लेने के बावजूद वे अभी फ़ारसी की अपनी पृष्ठभूमि से पीछा नहीं छुड़ा पाए थे। फोर्ट विलियम कालेज वह पहली संस्था थी जिसने उर्दू गद्य में एक नया मार्ग प्रशस्त किया। उसका उद्देश्य मुख्य रूप से उन नये क्लकों के लिए उपयुक्त पाठ्यपुस्तकें तैयार करना था, जो इंग्लैंड में ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेवा में भरती होते थे और सरकारी शासनतन्त्र के अंग के रूप में भारत आते थे। उन्हें उर्दू सीखनी पड़ती थी। क्योंकि वही आम लोगों की बोलचाल की भाषा थी।

लॉर्ड वेलेजली ने इस कालेज की स्थापना तैयार करने के लिए देश के विभिन्न भागों से काफी संख्या में लेखकों और कवियों को भरती किया गया था, जो या तो फारसी और अरबी से पुस्तकों का अनुवाद करते थे या मौलिक रचनाएं तैयार करते थे। इन रचनाओं की भाषा को सरल और आम बोलचाल की भाषा के निकट रखना आवश्यक था।

ग़ालिब  ने इनमें से कुछ पुस्तकों को पढ़ा था। कुछ लोगों का मत है कि ग़ालिब  पत्र लेखन की उस अंग्रेजी शैली से प्रभावित हुए थे जो बिना किसी लम्बी-चौड़ी और घुमावदार भूमिका के, जैसी कि उस समय की टकसाली फारसी और उर्द में आम प्रथा थी, सीधे अपने कथ्य विषय पर आ जाती थी।

कलकत्ता जाने के पहले ही, जब ग़ालिब  अपना पूरा लेखन फ़ारसी में ही करते थे, तब भी उन्होंने इस शैली का विरोध किया था और उस समय प्रचलित अनावश्यक बंधनों से भाषा को मुक्त करने का समर्थन किया था। फिर भी, सच है कि फोर्ट विलियम कालेज द्वारा तैयार की गई सीधी और सरल गद्य रचनाओं को पढ़कर ग़ालिब को एक स्वस्थ अनुभव हुआ और उसकी पहली मान्यता की पुष्टि हुई।

वे लगभग तीन साल की अनुपस्थिति के बाद 1829 की फरवरी के अन्त में दिल्ली वापस पहुंचे।


संदर्भ

मालिक राम, मिर्ज़ा ग़ालिब, अनु. श्रीकान्त व्यास, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया

Pratyush Prashant

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Translate »
“गर्मी में सेहत का साथी – पिएं सत्तू, रहें फिट और कूल!” एंडोमेट्रियोसिस – एक अनदेखी बीमारी चुप्पी तोड़ो, मदद लो! “महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य: अनदेखा न करें!” प्रेम क्या है…