हेति सुकन्या: स्त्री संघर्ष, स्वाभिमान और भाषा की समृद्धि का पुनर्पाठ


हेति सुकन्या: स्त्री संघर्ष, स्वाभिमान और भाषा की समृद्धि का पुनर्पाठ
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता”—अर्थात जहां नारी की पूजा होती है। इस प्राचीन वाक्य की पड़ताल कहानीकार सिनीवाली ने अपने उपन्यास हेति सुकन्या: अकथ कथा में की है, जो रुद्रादित्य प्रकाशन, प्रयागराज से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका सिनीवाली ने मिथकीय काल में कल्पना और तथ्यों के सहारे प्रवेश किया है। उन्होंने उस भाषा को पुनर्जीवित किया है, जो हिंदी साहित्य की लेखन शैली में लगभग विलुप्त हो चुकी है।
हेति सुकन्या: अकथ कथा में सिनीवाली ने इस तथ्य को उजागर किया है कि भारतीय मिथकीय साहित्य में महिलाओं के अस्तित्व के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार कैसे किया गया। इस उपन्यास की भाषा पाठकों के लिए एक ओर चुनौतीपूर्ण हो सकती है, तो दूसरी ओर उन्हें यह एहसास भी कराती है कि हमारी भाषा कितनी समृद्ध रही है। लेखिका ने एक विशेष कालखंड की तत्कालीन भाषा को अपनाकर हेति सुकन्या: अकथ कथा के लिए एक अनूठा आयाम दिया है, जो उनके लिए भी एक चुनौती से कम नहीं रहा होगा।
इस उपन्यास की भाषा जहां इसकी प्रमुख पहचान बनती है, वहीं राजकुमारी सुकन्या के संघर्ष और स्वाभिमान की कथा समकालीन स्त्री संघर्ष को एक नया दृष्टिकोण देती है। यह उपन्यास स्पष्ट करता है कि कालखंड कोई भी हो, स्वतंत्र चेतना और आत्मसम्मान से युक्त स्त्री व्यक्तित्व का होना समाज के लिए हमेशा एक चुनौतीपूर्ण कथा रहा है।
हेति सुकन्या: इतिहास के अकथ पन्नों से स्वाभिमान की कथा
सिनीवाली अपने उपन्यास हेति सुकन्या: अकथ कथा की मूल अवधारणा को स्पष्टता से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। वह इस रचना को अपनी मां सहित उन सभी स्त्रियों को समर्पित करती हैं, जो पतिगृह में अपने दायित्वों को पूरी निष्ठा से निभाती हैं, लेकिन उनका श्रेय कभी नहीं मिलता।
इस उपन्यास की मुख्य पात्र सुकन्या भी एक ऐसी ही स्वाभिमानी और कर्मठ स्त्री है, जिसे इतिहास ने केवल च्यवन ऋषि की पत्नी के रूप में सीमित कर दिया। परंतु, इस परिचय के पीछे छिपी सुकन्या के गुण, कौशल और व्यक्तित्व को कभी सामने नहीं लाया गया। सुकन्या का स्वाभिमान, प्रेम, करुणा से भरा हृदय, वनस्पतियों से उसका सहज लगाव, और औषधियों का प्रयोग करने की उसकी असाधारण क्षमता इतिहास के अकथ पन्नों में दबकर रह गई।
सिनीवाली की लेखनी में सुकन्या का व्यक्तित्व महादेवी वर्मा की कविता “घर तिमिर में, उर तिमिर में, आओ सखी, एक दीपक बार लें” की छवि प्रस्तुत करता है। सुकन्या अपने जीवन में मां के शब्दों को आत्मसात करती है—चाहे जीवनपथ हो या कोई अन्य मार्ग, हमेशा यह सुनिश्चित करो कि वह प्रकाशमय रहे। वह संध्या वंदन की तरह दीपक प्रज्वलित करती है और तेज़ हवाओं में जब दीपशिखा डगमगाती है या बुझने लगती है, तो उसे फिर से प्रज्वलित कर देती है।
सुकन्या की कथा एक प्रेरणा है, जो यह सिखाती है कि प्रज्वलित दीपक, ज्योति पुंज के समान होता है। एक दीपक कई दीपों को प्रकाशित करता है। जहां प्रकाश है, वहीं जीवन है। सुकन्या का जीवन केवल एक अकथ कथा नहीं, बल्कि इतिहास में दबे स्त्री स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
हेति सुकन्या: स्त्री अधिकारों की अनदेखी और पतिव्रता की परिभाषा पर पुनर्विचार
हेति सुकन्या: अकथ कथा का अंतिम खंड समाज में महिलाओं की दोयम स्थिति तक पहुंचने की प्रक्रिया को प्रभावी रूप से उजागर करता है। सिनीवाली ने बे-मेल विवाह की प्रथा को कटघरे में खड़ा करने का साहसिक प्रयास किया है।
उपन्यास में उर्वि के संवादों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि धर्म और सामाजिक प्रथाएं कैसे महिलाओं के अधिकारों को नियंत्रित करने का उपकरण बन गईं। जब उर्वि कहती है, “कर्तव्य तथा अधिकार के संतुलन को ही धर्म कहते हैं। परंतु अब धर्म, संतुलन नहीं बल्कि स्वार्थसिद्धि के उपकरण में परिवर्तित हो रहा है,” यह स्पष्ट हो जाता है कि परंपराओं के नाम पर महिलाओं की सहमति और इच्छाओं को लगातार अनदेखा किया गया।
महर्षि च्यवन और सुकन्या के विवाह का संदर्भ देकर उर्वि बताती है कि किस तरह वृद्ध पुरुषों और बालिकाओं के बीच विवाह को सामाजिक स्वीकृति दी जाने लगी। जब राजा स्वयं अपनी बेटी के विवाह को अनुचित ठहराने में असमर्थ रहे, तो प्रजा से किसी बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ हो गया। उर्वि की यह पीड़ा न केवल सुकन्या के अनुभवों को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे महान तपस्वी के कार्यों को उद्धरण बनाकर सामाजिक मान्यता दी जाती है।
इस संवाद में सुकन्या और उर्वि स्त्री के अधिकारों के हनन और पतिव्रता धर्म की आलोचना करती हैं। वे यह सवाल उठाती हैं कि क्या पतिव्रता की परिकल्पना केवल स्त्री के लिए एक सीमा रेखा तय करने का साधन है? क्या यह उसकी प्रतिभा और योग्यता को दबाने का षड्यंत्र नहीं है?
हेति सुकन्या: महापाप की परिभाषा और साधुत्व पर सवाल
हेति सुकन्या: अकथ कथा पढ़ते समय अनायास ही मनोज वाजपेयी अभिनीत फिल्म एक बंदा काफी है का एक संवाद स्मरण हो आता है। इस संवाद में मनोज वाजपेयी का चरित्र अदालत में कहता है कि जब प्रभु श्रीराम ने रावण का वध किया, तो रावण को मोक्ष नहीं मिला। रावण, जो भगवान शिव के परमप्रिय भक्त थे, मरने के बाद वर्षों तक तपस्या करते रहे ताकि शिवजी उन्हें दर्शन देकर क्षमा करें। लेकिन भगवान शिव ने ऐसा नहीं किया।
पार्वती जी यह देखकर विचलित हो गईं और शिवजी से पूछने गईं, “हे प्रभु, आप इतने कठोर क्यों हैं? रावण जैसे परमभक्त को दर्शन क्यों नहीं देते और उसे क्षमा क्यों नहीं करते?”
शिवजी ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “हे पार्वती, संसार में कुकर्म को तीन भागों में बांटा गया है:
- पाप, जो व्यक्ति जाने-अनजाने करता है और जिसका निवारण प्रायश्चित और माफी से संभव है।
- कुकर्म, जो अति पाप के रूप में जाना जाता है, जैसे जघन्य अपराध। इन्हें भी कुछ हद तक क्षमा किया जा सकता है।
- महापाप, जिसका कोई प्रायश्चित या माफी संभव नहीं है।”
पार्वती जी ने पूछा, “हे प्रभु, रावण ने तो सीता का अपहरण किया था। वह तो अति पाप की श्रेणी में आना चाहिए। आपने इसे महापाप क्यों माना?”
शिवजी ने फिर मुस्कुराते हुए कहा, “हे पार्वती, जिस पाप का प्रभाव समूची मानवता और धर्म पर सदियों तक बना रहता है, वह महापाप कहलाता है। यदि रावण ने रावण बनकर सीता का अपहरण किया होता, तो मैं उसे माफ कर सकता था। लेकिन उसने साधु का वेश धारण कर यह कृत्य किया, जिससे संसार के साधुत्व और धर्म पर अमिट धब्बा लगा। ऐसा पाप क्षम्य नहीं है।”
यह संवाद सीधे हेति सुकन्या की कहानी और उसके प्रश्नों से जुड़ता है। महर्षि च्यवन का सुकन्या के प्रति वासनामोहित होना, उसे विवाह के लिए विवश करने के लिए छल करना, क्या साधुत्व और धर्म पर वैसा ही धब्बा नहीं है?
सिनीवाली का यह उपन्यास न केवल मिथकों की आलोचना करता है, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच और साधुत्व के नाम पर स्त्रियों के अधिकारों के हनन को उजागर करता है। यह सवाल उठाता है कि समाज में पौराणिक पात्रों को नैतिकता और आदर्शों से परे क्यों रखा गया है?
सुकन्या का सत्य और साहित्य
हेति सुकन्या: अकथ कथा के अंतिम खंड में सुकन्या महर्षि च्यवन से संवाद करते हुए गहन और सशक्त विचार प्रस्तुत करती है। वह कहती है:
“सत्य है कि काम तत्व सृष्टि निर्माण के लिए आवश्यक है, परंतु इसका संबंध तन और मन दोनों से होता है। जब मन पर विजय प्राप्त होती है, तो प्रेम पवित्रता की ओर अग्रसर होता है। यही स्वस्थ मानसिकता स्वस्थ परंपराओं का आधार बनती है।“
सुकन्या महर्षि च्यवन को उनके कर्मों का सामाजिक प्रभाव समझाते हुए कहती है कि उनके कार्य जनमानस की मानसिकता को प्रभावित करेंगे और इसे पतन की ओर ले जाएंगे। सुकन्या की दृष्टि में, समाज का संचालन मनुष्य की मनोवृत्ति से होता है, और इस पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
सुकन्या महर्षि च्यवन को उनके कर्मों की दूरगामी परिणति की ओर इंगित करती है। यह सुकन्या की प्रकृति और समय में विश्वास को दर्शाता है। वह मानती है कि समय, जो सभी संतानों को समान रूप से देखता है, अंततः सत्य को उजागर करता है और न्याय करता है।“पुरुष स्त्री देह पर अधिकार स्थापित करने के लिए कुकर्म करता रहेगा।” यह पंक्ति समाज में स्त्री के प्रति हो रहे अन्याय और पितृसत्तात्मक मानसिकता की गहरी आलोचना है।
सिनीवाली ने इस उपन्यास के माध्यम से न केवल सुकन्या की कथा को जीवंत किया है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक प्रश्न भी उठाया है लेखिका ने पुरातन शैली की हिंदी भाषा को पुनर्जीवित किया है, जो पाठकों के लिए एक चुनौती तो है, लेकिन यह उपन्यास को साहित्यिक गरिमा प्रदान करती है। यह सिनीवाली की विशेष उपलब्धि है कि सोशल मीडिया और डिजिटल युग के distractions के बावजूद उपन्यास पाठक को अंत तक बांधे रखता है। लेखिका ने न केवल कथानक में साहित्यिक सौंदर्य बनाए रखा है, बल्कि सुकन्या के माध्यम से गहन संवेदनशीलता और दार्शनिक विचारों को भी पिरोया है।

किसी भी व्यक्ति का परिचय शब्दों में ढले, समय के साथ संघर्षों से तपे-तपाये विचार ही दे देते है, जो उसके लिखने से ही अभिव्यक्त हो जाते है। सम्मान से जियो और लोगों को सम्मान के साथ जीने दो, स्वतंत्रता, समानता और बधुत्व, मानवता का सबसे बड़ा और जहीन धर्म है, मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं अपने वर्तमान और भविष्य में भी इन चंद उसूलों के जीवन जी सकूंगा और मानवता के इस धर्म से कभी मुंह नहीं मोड़ पाऊगा।